साथियों, देश में कोरोना वायरस की तीसरी लहर का खतरा बना हुआ है। इसलिए हम सभी को सजग रहने की जरूरत है। वैक्सीन जरूर लगायें और कोविड नियमों का पालन करें। तभी हम स्वयं की व दूसरों की सुरक्षा कर पाने में सक्षम हो पायेेंगे।

प्रो.शेर सिंह बिष्ट: गोल्ड मेडल से हिंदी विभागाध्यक्ष तक की यात्रा

श्रद्धेय गुरू व साहित्यकार प्रो. शेर सिंह बिष्ट का 19 अप्रैल, 2021 को निधन हो गया। उनके निधन से साहित्य एवं शिक्षा क्षेत्र की अपूरणीय क्षति हुई है। यहाँ प्रस्तुत है प्रो. बिष्ट के शैक्षिक व साहित्यिक योगदान का संक्षिप्त विवरण-

प्रो. शेर सिंह बिष्ट: गोल्ड मेडल से हिंदी विभागाध्यक्ष तक की यात्रा

जन्म और शिक्षा-

    प्रो. शेर सिंह बिष्ट का जन्म 10 मार्च, 1953 को अल्मोड़ा जनपद के भनोली गाँव के कृषक परिवार में हुआ था। आपके पिता का नाम श्री नरसिंह बिष्ट और माता का नाम श्रीमती उर्मिला बिष्ट था।  

   आपने अपनी प्राथमिक शिक्षा प्राथमिक विद्यालय भनोली से और माध्यमिक व उच्चतर माध्यमिक शिक्षा ज्ञानोदय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय भनोली से प्राप्त की। इंटरमीडिएट सर्वोदय इंटर कॉलेज जयंती से उत्तीर्ण किया। इसके पश्चात आपने बी.ए. राजकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय अल्मोड़ा (आगरा विश्वविद्यालय) से और एम.ए. डीएसबी परिसर नैनीताल से उत्तीर्ण किया। एम. ए. (हिंदी) में आपने विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान प्राप्त किया, जिस कारण इन्हें स्वर्ण पदक (गोल्ड मेडल) से सम्मानित किया गया। 

       आपने 1980 में ‘हिंदी कृष्ण-काव्य की दार्शनिक पृष्ठभूमि’ (1400 से 1600 इ. तक) विषय पर कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पीएचडी और 1988 में ‘सुमित्रानंदन पंत के काव्य का ध्वनिवादी अध्ययन’ विषय पर कुमाऊँ विश्वविद्यालय से ही डी. लिट की उपाधि हासिल की।

व्यवसाय-

     डॉ. बिष्ट की नियुक्ति 27 जुलाई, 1976 में डी.एस.बी कालेज, नैनीताल के हिंदी विभाग में हिंदी के असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर हुई। यहाँ उन्होंने सितंबर, 1982 तक अध्यापन किया और उसके बाद इनका स्थानांतरण एस. एस. जे. परिसर, अल्मोड़ा में हो गया। लगभग 42 वर्षों तक महाविद्यालय व परिसर में सहायक प्राध्यापक, उपाचार्य, आचार्य, कुलानुशासक, हिंदी विभागाध्यक्ष, आदि पदों पर सेवा करते हुए आप 31 मार्च, 2018 को यो सेवानिवृत हो गये। 

परिवार-

        डॉ. बिष्ट की पत्नी का नाम श्रीमती विमला बिष्ट है। परिवार में इनके दो पुत्र हैं। बड़े बेटे का नाम पृथ्वीराज सिंह है और छोटे बेटे का नाम आदित्यप्रताप सिंह। बड़े बेेेेटे ने एम.सी.ए. डिग्री हासिल की और तत्पश्चात बंगलौर में ओरेकल कंपनी में नियुक्ति प्राप्त की। पृथ्वीराज वर्तमान में सीनियर मैनेजर पद पर कार्यरत थे, किंतु दुर्भाग्य से वे भी पिता के वर्तमान निवास स्थान हल्द्वानी में कोरोना महामारी से जूझ रहे हैं। 

       डॉ. बिष्ट का छोटा बेटा आदित्यप्रताप सिंह मेलबर्न (आस्ट्रेलिया) के नेशनल बैंक में एक महत्वपूर्ण पद पर कार्यरत है। इनके दोनों पुत्रों का विवाह हो गया है। 

रचनात्मक यात्रा-

        डा. बिष्ट ने एम.ए. में अध्ययन करते हुए ही कविता, कहानी लेखन शुरू कर दिया था, किंतु उनकी पहली कविता सन् 1993 में ‘कविता अधूरी है’ शीर्षक से अल्मोड़ा से प्रकाशित होने वाली पुरवासी पत्रिका में प्रकाशित हुई। भगवान गौतम बुद्ध, महात्मा गांधी और संत कबीर को अपना आदर्श मानने वाले डा. बिष्ट ने हिंदी और कुमाउनी शोध, निबंध, समालोचना, कविता के क्षेत्र में निरंतर कार्य किया। 

प्रकाशित मौलिक पुस्तकें-

      डॉ. शेर सिंह बिष्ट ने 29 हिंदी, 5 कुमाउनी और 2 शब्दकोश ग्रंथों का लेखन किया। उनके द्वारा लिखी गई मौलिक पुस्तकों का कालक्रमानुसार उल्लेख निम्नलिखित है-

1. मौलिक हिंदी पुस्तकें- 

1. वैष्णव धर्म संप्रदायों के दार्शनिक सिद्धांत और कृष्णभक्ति काव्य (शोध ग्रंथ, 1990)
2.सुमित्रानंदन पंत के साहित्य का ध्वनिवादी अध्ययन ( शोध ग्रंथ, 1990)
3. ध्वनि-सिद्धान्त (1992)
4. साहित्य एवं संस्कृतिः चिंतन के नये आयाम (1992)
5. पंत साहित्य और गाँधीवाद (1995)
6. कुमाऊँ हिमालयः समाज एवं संस्कृति (1999, 2006, 2009 )
7. परखे हुए लोग (हिंदी कविता संग्रह, 2000)
8. कुमाउनी कहावतों में कृषि विषयक ज्ञान (सहलेखन में, 2001)
9. मध्य हिमालयी समाज, संस्कृति एवं पर्यावरण (2003)
10. उत्तरांचल : भाषा एवं साहित्य का संदर्भ (2004)

11. हिंदी भाषा एवं साहित्य : एक अंतर्यात्रा (2005) 12. कुमाऊँ हिमालय की बोलियों का सर्वेक्षण (2005)
13. कुमाउनी भाषा और साहित्य का उद्भव एवं विकास (2006, 2011)
14. सुमित्रानंदन पंत (2009),
15. कुमाउनी : सहभाषा श्रृंखला (2010)
16. उत्तराखण्ड के रचनाकार एवं रचनाएँ (2013)
17. युगद्रष्टा कबीर (आलोचना, 2013)
18. युगबोध का साहित्य (आलोचना, 2014)
19. कुमाउनी कहावतें एवं मुहावरे : विविध संदर्भ (2014)
20. साहित्य और समालोचना (आलोचना, 2014 )

21. स्वामी विवेकानंद एवं भगवान गौतम बुद्ध (हिंदी कविताएँ, 2014)
 22. शब्द के विरुद्ध (हिंदी कविता संग्रह, 2016)
23. मेरा रचना संसार : पहचान और परख (2016) 24. युग सत्य (हिंदी कविता संग्रह, 2016)
25. समीक्षा की कसौटी पर (2017)
26. पर्यावरण एवं भारतीय संस्कृति (2018)
27. कुमाउनी बाल साहित्य (2018)
28. गोविंद बल्लभ पंत ( 2020 )
29. महाबली मैद सौन और केसि सौन (2020) 

नवीनतम हिंदी पुस्तक-

      अविचल प्रकाशन, हल्द्वानी से वर्ष 2020 में ‘महाबली मैद सौन और केसि सौन’ शीर्षक से प्रो.शेरसिंह बिष्ट का एक नवीनतम और महत्वपूर्ण ग्रंथ प्रकाशित हुआ है। लोक गाथाओं पर आधारित इस ग्रंथ में कुमाऊँ के दो महाबली शूरवीरों की जीवनगाथा और चंद राजाओं के शासन काल में उनके योगदान को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है, जिनका यहाँ के राजनीतिक दस्तावेजी इतिहास में कहीं उल्लेख नहीं है, लेकिन लोक इतिहास में वे अभी भी जीवित हैं। इसका प्रत्यक्ष प्रमाण उनकी लोकगाथाओं पर आधारित हुड़की बौलों (कृषि गीतों) में देखा जा सकता है।

2. मौलिक कुमाउनी पुस्तकें- 

1.भारत माता (कुमाउनी कविता संग्रह, 1998) 
2. इजा (कुमाउनी कविता संग्रह, 2000) 
3. उचैण (कुमाउनी कविता संग्रह, 2007, 2012)
4. मन्खि (कुमाउनी निबंध संग्रह, 2004, 2013)
5. भारतक भविष्य (कुमाउनी निबंध संग्रह, 2014)

3. शब्दकोश-

1. हिंदी-कुमाउनी-अंग्रेजी शब्दकोश (1994)
2. कुमाउनी-हिंदी कहावत कोश (2012) 

संपादित पुस्तकें-

1. कथा विविधा (सह संपादन, 1981)
2. सूर्योदय से पहले (संपादन, 1981)
3. आधुनिक हिंदी काव्य संकलन, (संपादन, 1991)
4. जनपदीय भाषा-साहित्य, (सह संपादन , 2005)
5. मानक हिंदी शब्दावली, (सह संपादन, 2005)
6. भाषा संप्रेषण : विविध आयाम (सहसंपादन, 2006)
7. कुमाउनी का परिनिष्ठित साहित्य, खण्ड-तीन (संपादन, 2007)
8. अद्यतन हिंदी कविता (सह संपादन, 2010)
9. शेरदा ‘अनपढ़’ संचयन (संपादन, 2011)
10. कुमाउनी वाचिक साहित्य (संपादन, 2016)

     इस प्रकार प्रो. शेर सिंह बिष्ट ने कुल 36 मौलिक और 10 संपादित पुस्तकों का लेखन किया। 

अन्य कार्य- 

        अध्यापन और लेखन के अलावा भी प्रो. शेर सिंह बिष्ट ने निम्नलिखित उल्लेखनीय कार्य किए-

1. शोध परियोजना- 05 (3 वृहद् तथा 2 लघु शोध परियोजनाओं पर कार्य)
2. शोध-निर्देशन- 16 विद्यार्थियों को पीएच.डी और 18 को लघु शोध प्रबंध में निर्देशन।
3. 60 से अधिक सेमिनारों, कार्यशालाओं में शोध- पत्र वाचन एवं प्रतिभागिता। 
4. पत्र-पत्रिकाओं में 225 लेख, शोध आलेख, 10 पुस्तक समीक्षाएं और 50 पुस्तकों की भूमिकाएँ हिंदी और कुमाउनी में प्रकाशित। 
5. आकाशवाणी से हिंदी और कुमाउनी में रचनाओं का प्रसारण। 

पुरस्कार और सम्मान- 

        शिक्षा और साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्यों हेतु डॉ. बिष्ट को निम्न पुरस्कारों व सम्मानों से सम्मानित किया गया-
1. एम.ए. में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान प्राप्त करने पर स्वर्ण पदक (1976)
2. आचार्य नरेन्द्रदेव अलंकार सम्मान (1993)
3. उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा सुमित्रानंदन पंत नामित पुरस्कार (2001)
4. यू.जी.सी. कैरियर अवार्ड (1993-1996)
5. उत्तरांचल रत्न अवार्ड (2003)


6. आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी राष्ट्रीय साहित्य सम्मान (2003)
7. भारत ज्योति अवार्ड (2006)
8. विवेक गोयल साहित्य पुरस्कार (2009)
9. महाकवि हरिशंकर आदेश साहित्य- चूड़ामणि सम्मान (2009)
10. मोहन उप्रेती शोध समिति सम्मान (2010)
11. देवसुधा रत्न अलंकरण सम्मान (2010)


12. उत्तराखण्ड भाषा संस्थान द्वारा डॉ.गोविन्द चातक सम्मान (2011)
13. शेरदा ‘अनपढ़’ कुमाउनी कविता पुरस्कार (2013)
14. श्री गुसाई सम्मान, मुम्बई (2013)
15. केन्द्रीय हिंदी निदेशालय का राष्ट्रीय शिक्षा पुरस्कार (2015)
16. लाइव टाइम अचीवमेंट अवार्ड (2016) 

      सहज, सरल, मधुर और आकर्षक व्यक्तित्व के धनी प्रो. शेर सिंह बिष्ट हिंदी और कुमाउनी भाषा के लिए आजीवन समर्पित रहे। राष्ट्रभाषा हिंदी की उनकी सुखद यात्रा एम.ए. हिंदी में गोल्ड मेडल प्राप्त करने से शुरू होकर कई पड़ावों से गुजरती हुई एस.एस.जे. परिसर, अल्मोड़ा के हिंदी विभाग में विभागाध्यक्ष पद तक पहुंचती है। कुमाऊँ विश्वविद्यालय में कुमाउनी भाषा विभाग की स्थापना हेतु भी वे प्रयासरत रहे। यद्यपि प्रो. शेर सिंह बिष्ट हमारे मध्य नहीं रहे, किंतु वे अपनी साहित्यिक कृतियों के द्वारा सदैव स्मरण किये जाते रहेंगे। 

 हमारी ओर से उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि….🌷🌷🌷

Share this post
One Comment

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!