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त्रिभुवन गिरि का आंचलिक खंडकाव्य: क्या पहचान प्रिया की होगी

हिंदी खंडकाव्य: क्या पहचान प्रिया की होगी साथियों, पुस्तक चर्चा के अन्तर्गत आज हम बात करेंगे हिंदी खंडकाव्य ‘क्या पहचान प्रिया की होगी’ की। इस खंडकाव्य के रचयिता हैं- त्रिभुुवन गिरि।   खंडकाव्य के विषय में- क्या पहचान प्रिया की होगी      ‘क्या पहचान प्रिया की होगी’ उत्तराखंड के प्रसिद्ध लेखक त्रिभुवन गिरि का हिंदी

नववर्ष की हार्दिक शुभकामनाएँ- नव वर्ष में कान्हा जी

आप सभी को आंग्ल नूतन वर्ष-2020 की हार्दिक शुभकामनाएँ– नव वर्ष में कान्हा जी    रहें ना किसी की पलकें प्यासी रहे ना किसी के घर में उदासी नव वर्ष में कान्हा जी, ऐसी बंशी मधुर बजाना।    आतंकवाद का भय ना रहे घोटालों की जय ना रहे महंगाई का ना हो विस्तार बेईमानी का

मुसाफिर का कोई घर नहीं होता

मुसाफिर का कोई घर नहीं होता   गाँव, कस्बा या कोई शहर नहीं होता आज यहाँ है तो कल वहाँ यारो मुसाफिर का कोई घर नहीं होता।    उम्मीदों के चिराग जलाये, रात-दिन घूमते हैं मंजिल को याद कर पल-पल झूमते हैं।  क्योंकि सपनों का कोई शिखर नहीं होता।  यारो मुसाफिर का कोई घर नहीं

प्रिय बहना, मैं अभी जिंदा हूँ

     हमारी वेबसाईट के कालम ‘कविता विशेष’ में आपके सामने जो पहली कविता रखी जा रही है, उसका शीर्षक है- ‘प्रिय बहना, मैं अभी जिंदा हूँ।’ कविता परिचय-      यह कविता साहित्यकार ‘बलवंत मनराल’ के ‘पहाड़ आगे: भीतर पहाड़’ कविता संग्रह से उद्धृत की गई है। कविता उत्तराखंड आंदोलन के समय रामपुर तिराहे

ओ प्रवासी पंछी तुझे गाँव बुलाता है

ओ प्रवासी पंछी तुझे गाँव बुलाता है तेरी याद में निशदिन रह-रह अकुलाता है,  ओ प्रवासी पंछी तुझे गाँव बुलाता है।    अनगिनत ख्वाबों को संग में ले चले उड़ते उड़ते तुम इतनी दूर उड़ चले वापस आना भी चाहो तो मन जलाता है ओ प्रवासी पंछी तुझे गाँव बुलाता है।   दादी मां के

पहाड़ की नारी

पहाड़ की नारी पहाड़ पर पग धरते-धरते पहाड़ पर रंग भरते-भरते पहाड़-पहाड़ करते-करते पहाड़ की नारी पहाड़ पर रहते-रहते पहाड़ को सहते-सहते पहाड़-पहाड़ कहते-कहते पहाड़ की नारी पहाड़ पर नमक बोते-बोते पहाड़ पर पलक धोते-धोते पहाड़-पहाड़ ढोते-ढोते पहाड़ की नारी पहाड़ पर हंसते-रोते पहाड़ को खोते पाते पहाड़-पहाड़ होते-होते पहाड़ की नारी पहाड़ हो ही
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