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लोकगायक हीरा सिंह राणा का कुमाउनी लोकसंगीत व साहित्य को योगदान

लोकगायक हीरा सिंह राणा का कुमाउनी लोकसंगीत व साहित्य को योगदान (Contribution of folk singer Heera Singh Rana to Kumauni folk music and literature) 


      साथियों, 13 जून, 2020 की रात्रि 2 बजे लोकगायक हीरा सिंह राणा के रूप में कुमाउनी लोकसंगीत के एक सुनहरे अध्याय का अंत हो गया। राणा जी का निधन कुमाउनी लोकसंगीत के एक स्वर्णिम युग का समाप्त हो जाना है। इस आलेख में राणा जी के कुमाउनी लोकसंगीत व साहित्य को दिये गये योगदान को रेखांकित करने का प्रयास किया गया है।

       हीरा सिंह राणा उत्तराखंड के प्रख्यात लोकगायक थे। राणा जी का जन्म 10 सितंबर, 1942 को अल्मोड़ा जिले के ढडोली (मानिला) गांव में हुआ था। आपकी माताजी का नाम नारंगी देवी व पिताजी का नाम मोहन सिंह था। राणा जी की प्राथमिक शिक्षा मानिला में हुई। उन्होंने दिल्ली सेल्समैन की नौकरी की लेकिन इसमें उनका मन नहीं लगा और इस नौकरी को छोड़कर वह संगीत की स्कालरशिप लेकर कलकत्ता चले आए और संगीत की दुनिया में स्वयं को स्थापित किया। आपने ‘प्योली और बुरांस’ के अलावा ‘मानिलै डानि’ और ‘मनखों पड़्योव में’ कविता-गीत संग्रह भी लिखे हैं। आप कुमाउनी साहित्य मंडल, दिल्ली में लोककला निर्देशक के पद पर भी रहे। वर्तमान में आप दिल्ली सरकार की कुमाउनी, गढ़वाली और जौनसारी भाषा-साहित्य अकादमी के उपाध्यक्ष थे। लोकसंगीत व साहित्य में अविस्मरणीय योगदान हेतु आपको अनेक सम्मानों से सम्मानित भी किया गया। हृदयगति रूक जाने के कारण आपका 13 जून, 2020 को निधन हो गया।

1. राणा जी का कुमाउनी लोकसंगीत को योगदान

     राणा जी का कुमाउनी लोकसंगीत को अतुलनीय योगदान रहा है। कई प्रसिद्ध गीतों की रचना आपने की और उन्हें अपने सुरीले स्वरों से सजाया। राणा जी ने कुमाउनी लोक संगीत को एक नई दिशा दी और उसे ऊचाँई पर पहुँचाया। आपने कुमाउनी लोकगीतों के ‘रंगीली बिंदी’, ‘रंगदार मुखड़ी’, ‘सौमनों की चोरा’, ‘ढाई बिसी बरस हाई कमाल’, ‘आहा रे जमाना’, ‘न्यौली पराणा’ आदि कैसेट्स भी निकाले। 

        आपका एक देशभक्ति पूर्ण गीतों से सराबोर कैसिट भी खासा चर्चा में रहा था, जिसमें धध्यूणो हिमाल चलो ठाड़ उठो, आजादी मिलिया पचास साल हैंगी जैसे देशभक्ति पूर्ण गीत संकलित थे। मेरी दृष्टि में यह राणाजी के सबसे श्रेष्ठ गीतों का संकलन था। ओज व देशभक्ति से पूर्ण ! दुर्भाग्य से इस कैसिट के गीत अब पता नहीं कहाँ- कहाँ बिखरे पड़े हैं !! उपर्युक्त दोनों गीतों की प्रारंभिक पंक्तियाँ आपके समक्ष प्रस्तुत हैं-

1. धध्यूणो हिमाल चलो ठाड़ उठो… 
गुलामी की रात बटी स्वराज तक, 
आजादी का बाद बटी आज तक,
भौत हैंगीं नेता यांका ठुल-ठुला 
कैल निकर ख्याल चलो ठाड़ उठो… 

2. आजादी मिलिया पचास साल हैगीं
सोच क्या हमूल और क्या हमर हाल हैगीं
नार लगूनी गरीबी मिटायेंगे
मिलबै सबै देश में घोटाल कैगीं। 

राणा जी के गाये कुछ लोकप्रिय गीत

१. रूपसा रमूली घुङर न बजा छम-छम
२. आलिली बाकरी लिली छ्यू छ्यू
३. रंगीली बिंदी घागर काई 
४. शिवहरी कैलाश तेरो डमरू बाजो
५. के सन्ध्या झूली रैछ
६. आजकल हरै ज्वाना मेरि नौली पराणा
७. धध्यूणो हिमाल चलो ठाड़ उठो
८. आजादी मिलिया पचास साल हैंगी 
९. दिन आनै जानै रया
१०. लस्का कमर बांदा, हिम्मत का साथा
११. क्या भलो मान्यौछा हमर पहाड़ मा
१२. टिमासैल हिटणियां हिटौण मन क्यै आम्हौ
१३. यौ जौभन छा जोभन हिट माठू-माठू
१४. गर हम पहाड़ी भला हन् रिवाड़ी
१५. धना धना धनुली
१६. शराबैकि थैली
१७. गोपुली बोराणा बिंसर न्है जानू धुरा
१८. हे माँ दूनागिरी की माई तेरी जै-जैकारी हो
१९. ऐ जाये बसंतिया होलि खेलूंल होलि
२०. आ म्यारा नजिक सुवा क्यलै रैछैं दूर
२१. तेरी खूबसूरती की खबर गरमा गरम छै
२२. आनी जानी सांस छै तू
२३. त्वीलै धारू बोला मधुली हीरा हिर मधुली
२४. अल्मोड़ै बजार हिट नंदादेवी म्यल देखूंला
२५. आहा रे जमाना ओहो रे जमाना। 

       इस प्रकार राणा जी ने विविध रसों के गीत लिखकर व गाकर कुमाउनी लोकसंस्कृति को विश्वभर में पहचान दिलाई।

2. राणा जी का कुमाउनी साहित्य को योगदान 

       राणा जी ने कुमाउनी कविता को तीन पुस्तकें प्रदान कीं। ये पुस्तकें हैं- ‘प्योली और बुरांस’, ‘मानिलै डानि’ और ‘मनखों पड़्योव में’। ये तीनों कविता व गीत संकलन हैं।

1. प्योली और बुरांस (Pyauli aur Burans) 

    ‘प्योली और बुरांस’ कविता व गीत संग्रह के रचयिता हीरा सिंह राणा हैं। इस संग्रह का प्रकाशन जून 1987 में हुआ। इसके प्रकाशक ठा० आनंद सिंह उमेद सिंह एंड संस, लाला बाजार अल्मोड़ा हैं। इस संग्रह में तीन भागों में कुल 31 कविता और गीत संगृहीत हैं। पहले भाग का नाम है ‘मिट्टी का मोह’। इस भाग में यौ तिरंगा मिलौ कफन, हमर देश मा, हमर पहाड़ मा आदि कुल 09 कविताएँ हैं। देशभक्ति इस भाग की विशेषता है। दूसरे भाग का नाम है ‘कसकता जीवन’। इस भाग में हम पीड़ लुकानैं रयां, हीरदी पीड़, ठोकर खानै, सुवा जून लैगै, हौंसिया आदि कुल 13 कविताएँ हैं। वेदना व करूणा इस भाग में मुखरित हुई है। तीसरे भाग का नाम ‘घाटी गूंजी जीवन झूमा है’। इस भाग में रूपसा रमूली, बाकरी, गाज्यौवा दिदी, आय हाय रे मिजाता आदि कुल 08 गीत संगृहीत हैं।

     राणा जी के इस संग्रह की कविताओं में वीर, श्रृंगार, करूण आदि रस प्रमुखता से मिलते हैं। आलंकारिकता व गीतात्मकता विद्यमान है। यह पुस्तक सामान्यतया बाजार में अनुपलब्धहै। इस संग्रह से ‘हम पीड़ लुकानै रयां’ कविता की कुछ पंक्तियाँ दी जा रही हैं-

दिन आनै जानै रया। 
हम बाटिकैं चानै रया। 
सांसों की धागिमा आंसों का। 
हम फूल गठ्यानै रया। 

बाजैं डाइम बासी घुघुति। 
जसि भुगति मैंल भुगति। 
बिन पाणिकै माछी जसी। 
पराणी तड़फानै रया। 

गरजी बाघइ जब सौणों की। 
मारि मारि बैंक गै घौणों की। 
हैंसी हैंसी बेर अपनी। 
हम पीड़ लुकानै रया। 

पुस्तक में संगृहीत राणा जी के लोकप्रिय गीत

1. रूपसा रमूली घुङर न बजा छम-छम। 
जागिजा मठूमठू जौंला, किलै जैंछै चम चम। 

2. आलिली बाकरी लिली छ्यू छ्यू।
   आलिली बाकरी लिली छ्यू छ्यू
    बाकरी ऐजा उज्याड़ न खा
    जोड़नू तिहाणि हाता…..।

3. रंगीली बिंदी घागर काई 
    धोती लाल किनार वाई
   आय हाय हाय रे मिजाता। 

4. फूल फटंगा हाय सुवा जून लैगै। 
यौ परदेश मा तेरी याद ऐगै। 

5. लस्का कमर बांदा, हिम्मत का साथा। 
फिरि भोव उज्याली हली, कां लै रली राता। 

6. क्या भलो मान्यौछा हमर पहाड़ मा। 
रूड़ा दिनू स्वर्ग रूंछ हमर पहाड़ मा। 

2. मानिले डानि (Manile Dani)

     राणा जी के इस संग्रह का प्रकाशन भी 1976 में मानिला महाविद्यालय निर्माण समिति, दिल्ली से हुआ। इस कुमाउनी कविता संग्रह में मानिला क्षेत्र से संबंधित कविताएँ संगृहीत हैं। इस संग्रह में बिंति, तल मानिल सदर, इस्कूलक इनर-किनर, काठौ तब्यौलनौं इस्कूल, रतखालपन, मल मानिल डुट्याव, मैं छौं हिरू, घानि बाजीगै लंबी कविताएँ संगृहीत हैं। तल मानिल सदर कविता से कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-

पार उ छ राणिखेत यौ, स्यौनीधुरा, 
यौ छा यौ नैधण, उ छा बिनसरा। 
कपोली छिनै कैं देखो धैं जरा, 
तौ देखौ भौनखाल नैनीतालै डानी। 

3. मनखों पड़्यौव में ( Mankhon Padyauw Mai) 

      राणा जी के इस कुमाउनी कविता-गीत संग्रह का प्रकाशन भी 1987 में हुआ और इसके प्रकाशक विनती प्रकाशन, मानिला, अल्मोड़ा हैं। इस संकलन में राणा जी के कुल 34 कविताएँ व गीत संगृहीत हैं। प्रारंभिक कविता ‘ढोक’ है और अंतिम कविता शीर्षक कविता ‘मनखों पड़्यौव में’ है। ठेठ कुमाउनी भाषा में लिखे इस काव्य संकलन में भी आप पहाड़ की संस्कृति व समाज के अनेक रंगों को देख सकते हैं। शीर्षक कविता की कुछ पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं-

मैं ले छौं बच्यौं एक, 
मनखों पड़्यौव में। 
ठड़ी गों न्यिरा न्यिरि, 
हजूरों की स्यौ में। 

कोछा हो गरहाक, 
सुणौ यां तौ आओ। 
चहाओ म्यकैं ले, 
क्वे भौ तो ठराओ। 

पुस्तक में संगृहीत राणा जी के लोकप्रिय गीत

1. आजकल हैरै ज्वाना, 
    मेरि नौली पराणा। 
   मेरि मन क्यै अरै बाना, 
   मेरि नौली पराणा।

2. टिमासैल हिटणियां
हिटौण मन क्यै आम्हौ। 
लटक दो-ढई छैं, 
धम्यौल झूल खाम्हौ। 

3. यौ जौभन छा जोभन
हिट माठू-माठू। 
तू एक्कै छै गौंपन, 
हिट माठू-माठू। 

4. गर हम पहाड़ी
भला हन् रिवाड़ी। 
तो मजबूत इमारत, 
है जानि ठाड़ी। 

        अतः हम कह सकते हैं कि लोकगायक हीरा सिंह राणा ने कुमाउनी लोक संगीत व साहित्य की समृद्धि में अभूतपूर्व योगदान दिया। राणा जी के निधन से पूरा उत्तराखंड शोकाकुल है।


भावपूर्ण श्रद्धांजलि

1. उत्तराखंड के मुख्यमंत्री श्री त्रिवेंद्र सिंह रावत – उत्तराखंड के महान लोक गायक, लोककवि व लोक संगीत के पुरोधा श्री हीरा सिंह राणा जी के निधन का समाचार सुनकर अत्यंत दु:ख हुआ। परमपिता परमेश्वर से दिवंगत आत्मा को शांति प्रदान करने व परिवार को इस दु:ख को सहने की शक्ति देने की प्रार्थना करता हूं।आपके जाने से लोकसंगीत को अपूर्णीय क्षति हुई है।

     हिरदा लोकसंस्कृति के मजबूत हस्ताक्षर थे, देवभूमि उत्तराखंड के सौंदर्य को अपने गीतों में जिस खूबसूरती से उन्होंने पिरोया, ऐसा शायद ही कोई और कर पाए। भावपूर्ण श्रद्धांजलि हिरदा। ॐ शांति शांति शांति। 

2. महाराष्ट्र के राज्यपाल श्री भगत सिंह कोश्यारी – कुमाऊनी के सर्वाधिक लोकप्रिय गीतकार, संगीतकार, गायक हीरा सिंह राणा की मृत्यु की दुखद खबर आ रही है. हृदयाघात से आज सुबह ढाई बजे दिल्ली में उनका निधन हो गया. वर्तमान में वे दिल्ली में गठित कुमाऊनी, गढ़वाली और जौनसारी भाषा अकादमी के उपाध्यक्ष भी थे. वे 77 साल के थे..हीरा सिंह राणा के निधन से उत्तराखण्ड के संगीत जगत को अपूरणीय क्षति पहुंची है। 

3. ‘पहरू’ के संपादक डॉ. हयात सिंह रावत-  कुमाउनी संगीत कैं देश- बिदेश में लोकप्रिय बणूण में राणा ज्यूक भौत ठुल योगदान छु। उनूकें गीत लेखण , गायकी और कविता लेखण इनार खास शौक छी । 1961 बै इनूल कविता लेखण शुरू करौ। यों कुमाउनी भाषाक एक समर्पित कलाकार व रचनाकार रई। उनूल कुमाउनी भाषा, संस्कृति कैं हमर देशै ना बल्कन बिदेश में लै प्रसिद्धी दिलै। राणा ज्यू  दिल्ली , कलकत्ता , मुंबई, चंडीगढ़ , जयपुर, अजमेर, लखनऊ, हरिद्वार तथा पुर कुमाऊँ में कुमाउनी कार्यक्रम करते रूंछी। श्री राणा ज्यू कैं कुमाउनी भाषा,  साहित्य एवं  संस्कृति प्रचार समिति कसारदेवी, अल्मोड़ा ओर दिल्ली में उत्तरांचल  सांस्कृतिक प्रसार समिति रोहिणी दिल्ली द्वारा आयोजित गणतंत्र दिवस समारोह २०२० में ‘शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’ कुमाउनी कविता पुरस्कार’ पुरस्कार द्वारा पुरस्कृत करी गो। आपणि गीतोंल,  मिठ अवाजल कुमाउनी भाषा कैं लोकप्रिय बणूण में उनरि ठुलि भूमिका रई छु।  हम पहरू कुमाउनी मासिक पत्रिका टीम और कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति कसारदेवी अल्मोड़ा कुमाउनीक महान कवि व लोकगायक श्री हीरा सिंह राणा ज्यू कैं श्रद्धासुमन अर्पित करनू , नमन करनू। 

4. उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी अध्यक्ष पी.सी.तिवारी – कोरोना काल में प्रिय साथी पुरुषोत्तम असनोड़ा को खोने के बाद उत्तराखंडी लोक जीवन के सरल,सहज,फक्कड़ रचनाकार, लोक गायक हीरा सिंह राणा का आकस्मिक निधन व्यथित कर देने वाला है। सामाजिक – राजनीतिक जीवन और पहाड़ के जनआंदोलनों में शामिल रहते हुए हमने उनको जाना पहचाना था। वे एक महान लोक कलाकार थे, उनके व्यक्तित्व, गीतों व आवाज का जादू पहाडों से निकलने वाली ठंडी हवाओं की तरह सकून देते थे।  15-16 जून 2013 को उत्तराखंड परिवर्तन पार्टी के रुद्रपुर में हुए दूसरे महाधिवेशन में वे हमारे मुख्य अतिथि थे। उनसे अंतिम मुलाकात दिसम्बर 2019 को सेंट्रेल पार्क दिल्ली में आयोजित कुमाऊनी गढ़वाली जौनसारी अकैडमी के कार्यक्रम में जिसके वे उपाध्यक्ष थे, चारु भाई के साथ हुई थी, औऱ अब उनकी मृत्यु की मनहूस खबर आई है, हीरा सिंह राणा जी अब नहीं है, यह विश्वास करने में समय लगेगा। 

5. लोकगायक बिशन सिंह हरियाला- दु:खद आश्चर्य दोस्तों, नहीं रहे उत्तराखंड की संस्कृति के स्तम्भ स्वर व सुरों के ज्ञाता सौम्य व सरल स्वभाव के धनी व्यक्तित्व गढ़वाली कुमांऊनी जौनसारी हिन्दी एकादमी के उपाध्यक्ष…..हमारे आदरणीय प्रेरणाास्रोत माननीय हीरा सिंह राणा जी ! उत्तराखंडी समाज में शोक की लहर दौड़ पड़ी है। कलाकार समाज स्तब्ध है।  भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करे और इस दुख भरी घड़ी में उनके परिवार को दुख सहन करने की ताकत दे। हमारी संवेदनाएं परिवार के साथ हैं। ऊं शांति। 

       हिमाल के इस कालजयी लोकगायक को हमारी ओर से भी विनम्र श्रद्धांजलि…..!!🙏🌷🙏


बोलती स्मृतियाँ : तस्वीरों में राणा जी


*आलेख लेखन, संचयन व प्रस्तुुुति*
© डॉ. पवनेश ठकुराठी।


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