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न्यौलि विधा की एकमात्र पुस्तक: न्यौलि सतसई

    प्रिय पाठकों, आज हम आपको ले चलते हैं उत्तराखंड के लोक साहित्य की ओर और चर्चा करते हैं लोक साहित्य की विधा ‘न्यौली’ से संबंधित पुस्तक ‘न्यौली सतसई’ की।

पुस्तक के विषय में-

न्यौली सतसई

        ‘न्यौली सतसई-१’ पुस्तक के लेेेेखक डॉ. देव सिंह पोखरिया हैं। इस पुुुस्तक का प्रकाशन तराण के सौजन्य से सन् 1987 में तराण प्रकाशन, अल्मोड़ा से हुुआ था। लेखक नेे यह पुुुस्तक अपने पिता को समर्पित की है।  इस पुस्तक का मुखपृष्ठ महंत त्रिभुवन गिरि जी ने बनाया है। ‘न्यौली सतसई-१’ पुुुस्तक में कुल 700 न्यौलियां संगृहीत हैं। न्यौलियों से पहले लेखक ने ‘गीत परिचय’ शीर्षक से न्यौली विधा का विस्तृत परिचय दिया है। डॉ. पोखरिया के अनुसार, न्यौली की शाब्दिक व्युत्पत्ति तीन तरह से मानी जाती है-

1. न्यौली- नव अवली अर्थात् नये गीतों की अवली
2.न्यौली- नवली अर्थात् नये छंदों की मौलिक आशुकविता
3. न्यौली- मादा पहाड़ी कोयल की प्रजाति, जो ‘न्यऊ- न्यऊ’ की बोली बोलती है। 

    अंतिम व्युत्पत्ति को लेखक ने लोक भावना के अनुकूल बताया है। 

    डॉ. पोखरिया के अनुसार, न्यौली का प्रतिपाद्य विषय प्रेम और श्रृंगार है। पुस्तक की न्यौलियों के संकलन में लेखक ने 64 लोकगायकों का सहयोग लिया है। लेखक ने न्यौलियों को उनकी विषय वस्तु के आधार पर स्तुति, प्रेम वर्णन, संयोग वर्णन, सौंदर्य वर्णन, नायिका भेद वर्णन, नराई, परदेश, बाटुली, चिट्ठी, बारहमासा, ऋतु वर्णन, स्मृति, टीस, वियोग वर्णन, माँ, भाई, सखी, सामाजिक परिवेश, युगीन चेतना, जीवन दर्शन, लोकोक्तियाँ, मंगलाशीष शीर्षकों में विभाजित किया है। 

पुस्तक से कुछ न्यौलियां नीचे दी जा रही हैं-

1. कुर्तो सिड़यो मशीन में, धोत्ति बजारै की। 
दिलै सुवा एक्कै हुंछी, माया हजारै की। 

2. पीली दानी नारिंग की, हरिया पुलम। 
नानी छ कै नि समझे, माया की जुलम। 

3. अठन्नी चवन्नी मेरी, बगस कुनूनी। 
दैन हात सिरानी हाले, बौं हात गलूनी। 

4. आस्मानी जहाज उड्यो, पछिल भौड़ाट। 
तेरि याद में लागी रैछ, आंसु की तौड़ाट। 

5. पात भलो केलड़ि को, रंङ भलो हल्दि को। 
तितो खानू मिठो हुंछ, तुमरि खल्दि को। 

6. घर-घर करन लागी, सोर जान्या गाड़ी। 
फूलदार पेटिकोट ल्याये, मायादार साड़ी। 

7. हापुर बजानि धुरा, काफल पाक्या लाल। 
कैथें कूलो को सुणलो, हिरदी का हाल।।


किताब का नाम- ‘न्यौलि सतसई’
विधा- लोकसाहित्य
लेखक- डॉ. देवसिंह पोखरिया
प्रकाशक- तराण, अल्मोड़ा
प्रकाशन वर्ष- 1987


लेखक के विषय में-

डॉ. देव सिंह पोखरिया

      डॉ. देव सिंह पोखरिया कुमाउनी लोकसाहित्य के विशेषज्ञ के रुप में जाने हैं। डॉ. पोखरिया का जन्म 7 जुलाई, 1953 को पिथौरागढ़ जनपद के डांगटी ( अस्कोट) गाँव में हुआ था। आपके पिता का नाम श्री प्रेम सिंह पोखरिया व माता का नाम श्रीमती यशोदा देवी था। आपने हिंदी, संस्कृत विषयों से एम. ए. उत्तीर्ण किया व हिंदी में कुमाऊँ विश्वविद्यालय से पीएचडी (1979) व डीलिट (1994) की उपाधियाँ हासिल कीं। आपके पीएचडी का विषय ‘कुमाऊँ के लोक छंदों का शास्रीय अध्ययन’ और डीलिट का विषय ‘छायावादी काव्य का छंदशास्त्रीय अध्ययन’ रहा है। 

     आपने कुमाऊँ विश्वविद्यालय के सोबन सिंह जीना परिसर,अल्मोड़ा में चालीस वर्षों तक प्रवक्ता, उपाचार्य, आचार्य, हिंदी विभागाध्यक्ष आदि पदों को सुशोभित करने के साथ ही समय-समय पर परिसर में कार्यक्रम अधिकारी, प्रोक्टर, अधिष्ठाता छात्र कल्याण, परिसर संकायाध्यक्ष, निदेशक परिसर, निदेशक महादेवी वर्मा सृजनपीठ आदि प्रशासनिक पदों पर भी कार्य किया। 

     डॉ. देव सिंह पोखरिया ने लगभग 30 पुस्तकों की रचना की है, जिनमें लोकसाहित्य पर आधारित पुस्तकों की संख्या सर्वाधिक है। डॉ. पोखरिया ने न्यौली सतसई (1987), कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति (1994), कुमाउनी लोकसाहित्य तथा कुमाउनी साहित्य (1994), कुमाउनी संस्कृति (1994), कृष्ण रूक्मिणी की गाथा(1995), भीमा कठैत की गाथा (1995), गड़देवी की गाथा (1995), नंदा जागर (1995), कसक (उपन्यास, 1995), कुमाउनी लोकगीत (1996), कुमाउनी लोकगाथाएं (1996), राफ ( कुमाउनी कविता संग्रह, 2000), राजुला मालूशाही (2004), उत्तराखंड की लोकगाथाएं (2005), उत्तराखंड: लोक संस्कृति और साहित्य (2009), नीलकण्ठ (कविता संग्रह, 2011), भतकौवे (कहानी संग्रह, 2014) आदि पुस्तकें लिखीं हैं। 

       कुमाउनी लोकसाहित्य को संकलित- संगृहीत करने व उसे राष्ट्रव्यापी बनाने में डा. पोखरिया का अतुलनीय योगदान है। 

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