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कुमाउनी की पहली महिला कवयित्री: देवकी महरा

कवयित्री देवकी महरा का कुमाउनी साहित्य को योगदान

      कवयित्री देवकी महरा ज्यूक जनम 26 मई, 1937 को अल्मोड़ा जिला के कठौली (लमगड़ा) गाँव में हुआ। देवकी महरा हिंदी और कुमाउनी दोनों भाषाओं में लिखतीं हैं। उनकी हिंदी में प्रेमांजलि (1960), स्वाति (1980), नवजागृति (2005) तीन कविता संग्रह, अशोक वाटिका में सीता (खंडकाव्य) और एक उपन्यास ‘सपनों की राधा’ (1982) किताब प्रकाशित हुई हैं। 

      कुमाउनी में देवकी महरा के दो कविता संग्रह ‘निशास’ और ‘पराण पुंतुर’ प्रकाशित हैं। ये कुमाउनी की पहली महिला कवयित्री के रूप में भी जानी जाती हैं। 

सम्मानित होती देवकी महरा

1. निशास (1984)- ‘निशास’ कविता संग्रह के पहले संस्करण का प्रकाशन 1984 में तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली से हुआ। इस किताब की भूमिका मोहन उप्रेती जी लिखी है। इस कविता संग्रह में कुल 49 कविता संगृहीत हैं।

      ये कविताएँ क्रमशः जय भवानी, तेरी मेरी प्रीति, भिटौली का दिन, ऊं जंगल कां हूं गया, मातृभूमि, बांसुरि बजै दे, जा जा चेली, रंगीली कौसाणी, जोड़ी का मिलाप, मैती मुलुक, रोपाई गीत, सौरासा न्हैगे, जाओ बेटी, आई खबर, करिया कमाई, तारीख छब्बीस, फैशनै की मार, मेरी रूपसी बाना, खटुली बाबू, बाद मधुली कमर, फूना दी गोछ, मा भवानी विचार, पहाड़ै कुंथी, लछुलि, उत्तरैणी त्यार, लाखै उमर, आपणै गीत, रामराज्य, य याद, कलजुगी औलाद, हरिया धरती, भारत माता च्याल, उम्र उधार, मजदूरन खून, कवि बाणि गो, ओ गीता आ, बाढ़ हिमालय, जागर, बणनेता, जमन दा, भोल उनरै छू, दल बदलू, प्रधान ज्यू, पहाड़ै चेली, चेलि, बिरादर, बहुरूपी, अफुलि पराणि आदि हैं। 

      इस संग्रह की कविताओं में पहाड़ी समाज और संस्कृति का अच्छा चित्रण हुआ है। इस संग्रह में उन्होंने पहाड़ के समाज, तीज-त्यार, पहाड़ की चेली, देवी-द्याप्त, रीति-रिवाज, परंपरा, सामाजिक बदलाव आदि को अपनी कविताओं का विषय बनाया है। ‘भिटौली का दिन’ कविता में ‘भिटौली’ त्यौहार का चित्रण करते हुए वो लिखती हैं-

‘चैतक महैण आयो, भिटोई का दिना…
डाला भरी-भरी इजू लगड़ ली आली।’ पृ.11

     अपनी ‘रंगीली कौसाणी’ कविता में प्रकृतिवादी कवि सुमित्रानंदन पंंत जी की जनमस्थली कौसानी का खुबसूरत प्राकृतिक वातावरण और उसकी सांस्कृतिक महिमा का बखान करते हुए लिखती हैं-

‘आहा! बुरूशी क फूल रंगीली कौसाणी।
आहा! पंत ज्यूक धाम रंगीली कौसाणी।।’ पृ.17

     कवयित्री देवकी महरा की कविताओं में जहाँ एक तरफ पहाड़ी समाज और संस्कृति चित्रित हुई हैं। वहीं दूसरी ओर उनकी कविताओं में दार्शनिकता और गहरा चिंतन भी दिखता है। ‘लाखै उमर’ कविता में वो मनखियों को सचेत करते हुए कहती हैं-

     नि गँवावो रे नि गँवावो
     य लाखों जिंदगी
     पराई जर, जोरू, जमीन
     कैं आँखि लगौणि में नि गँवावो। पृ. 45

        इसी तरह ‘हरिया धरती’ कविता में वे मानवीय संबंधों के उस पक्ष का चित्रण करती हैं जिसमें हमारे अपने ही हमें धोखा दे जाते हैं-

’जनूकैं आपण बताछ
उनूल मारै मार दे।
बिराणाल प्यारै प्यार देछ
कसी करूं-
आपण पराया पछ्याण।’’ पृ.56

2. पराण पुतुर (2010)- देवकी महरा के दूसरे कविता संग्रह ‘पराण पुंतुर’ का प्रकाशन सन् 2010 में आधारशिला प्रकाशन, हल्द्वानी (नैनीताल) से हुआ। इस कविता संग्रह की भूमिका प्रसिद्ध कवि शेर सिंह बिष्ट ‘शेरदा अनपढ़’ जी ने लिखी है और इस कविता संग्रह को कवयित्री ने आपने पौत्र चंद्रेश (13 फरवरी, 1977-18 मार्च, 2009) को समर्पित किया है। ‘पराण पुंतुर’ में देवकी महरा की कुल 45 कविता संगृहीत हैं। 

      ये कविताएँ क्रमशः पराण-पुंतुर, बणै दिया, हरै गयी, नंदा भ्रामरी, के नि चैन, जो तू कौ लै, इदू निशास, का्थ, मनाओ मंगल, दुणी, सुख, जनू लिबेर, बसंती बहार, फुटी भान, तू किलै रिसाई, राज, होेलि, आडस, के दि जालै, तू, है जै के जां, लिलाट, मैं इकली कसी रूंल, आज-भोव, जाणि को, तेरो दरबार, करमै लेख, हरी चड़ी चाइयै रैगै, जमनदा, याद, पीड़क जंगल, मतलबी संसार, समझि-समझि मारनौ डाड़, आपणै गीत, प्रेम पत्र, जागर, मानस पुत्री, क्वै न्हैं, अकल, यसी छू, नानू छी, कुंथी, भौत ऐ गोय, मिकैं, नि मिल हैं। 

      पहले कविता संग्रह निशास की कुछ कविता जैसे जमन दा, जागर, कुंथी आदि इस संग्रह में दुबारा शामिल हुई हैं। कवयित्री ने इस संग्रह में पहाड़ के देवी-देवताओं, समाज, सामाजिक बदलाव, रहन-सहन, रीति-रिवाज, तीज-त्यार, मनखी सुभाव, प्रकृति आदि को अपनी कविताओं का विषय बनाया है।

       शीर्षक कविता ‘पराण-पुंतुर’ में कवयित्री ने चंद्रेश को याद किया है और उसके लिए अपना लाड़-प्यार प्रदर्शित किया है-

‘‘सरग में मिलैं जनूकैं शरण
चंद्रेश उनरि चार-
बाणि जाये अगास तार,
करनै रये उज्याव।’’ पृ.-11

     संग्रह की ‘बसंती बहार’ कविता में कवियित्री ने बसंत ऋतु का आलंकारिक चित्रण किया है-

कफुवा बासण फैगो अमुवां की डाई में,
धरतीक रूप जस, सुन में सुहाग छू।
पिंगई -पिंगई धोती, सरसों का बाग में,
पगला पगली जानी, फाल्गुनी फाग में। पृ. 28

      पहले कविता संग्रह की तरह इस संग्रह में भी कवयित्री की दार्शनिक भावना उनके जीवन दर्शन के रूप में उजागर हुई है। एक उदाहरण देखिए-

के दि जालै तू दुणी कैं
के दि जौंल मी
के ली जालै तू दुणी बै,
के लि जौंल मी। पृ.-37

      कवयित्री ने अपनी कविताओं में इस दुनिया की सच्चाई को उजागर किया है। कवयित्री इस बात को अच्छी तरह जानती है कि इस संसार में सब मतलबी लोग रहते हैं-

तितुरी की गर्दन, दातुली का धार में,
भुलि बै लै झन डुबिया,मतलबी संसार में। पृ.54

      कवयित्री देवकी महरा की कविताओं की भाषा सहज, सरल और ग्राह्य है। आलंकारिकता, लयात्मकता भी इनकी कविताओं में दिखती है। छंदबद्ध और छंद मुक्त दोनों प्रकार की कविताओं की रचना इन्होंने की है।

       निष्कर्ष रूप में हम यह कह सकते हैैं कि कवियित्री देवकी महरा ने ‘निशास’ और ‘पराण पुंतर’ कुुल 2 कविता संग्रह कुमाउनी साहित्य को प्रदान किए हैं। साथ ही वे कुमाउनी की पहली महिला कवियित्री भी हैं। इस हिसाब से उनका योगदान अत्यधिक महत्वपूर्ण है। देवकी महरा की कविताओं में कुमाऊं के समाज, संस्कृति, धर्म, राजनीति सबको चित्रित होने का अवसर मिला है। मनुष्य स्वभाव, नारी की समस्या और सामाजिक यथार्थ को भी इन्होंने अपनी कविताओं के माध्यम से उजागर किया है। एक महिला कवियित्री रूप में कुमाउनी कविता संसार उनके योगदान को हमेशा याद रखेगा। 

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