साथियों, देश में कोरोना वायरस की तीसरी लहर का खतरा बना हुआ है। इसलिए हम सभी को सजग रहने की जरूरत है। वैक्सीन जरूर लगायें और कोविड नियमों का पालन करें। तभी हम स्वयं की व दूसरों की सुरक्षा कर पाने में सक्षम हो पायेेंगे।

कुमाउनी कविता संग्रह: प्योली और बुरांस, Kumauni Poetry Collection: Pyauli aur Burans

कुमाउनी कविता संग्रह: प्योली और बुरांस
Kumauni Poetry Collection: Pyauli aur Burans 

      क्या जानते हैं रूपसा रमूली घुङर न बजा छम-छम, आलिली बाकरी लिली छ्यू छ्यू, रंगीली बिंदी घागर काई जैसे लोकप्रिय गीतों के रचनाकार कौन हैं ? पुस्तक चर्चा के अन्तर्गत आज हम बात करते हैं इसी रचनाकार के कुमाउनी कविता व गीत संग्रह ‘प्योली और बुरांस’ की। इस संग्रह के रचयिता हैं सुप्रसिद्ध लोकगायक हीरा सिंह राणा।

कविता संग्रह के विषय में-

प्योली और बुरांस’

       ‘प्योली और बुरांस’ कविता व गीत संग्रह के रचयिता हीरा सिंह राणा हैं। इस संग्रह का प्रकाशन जून, 1987 में हुआ। इसके प्रकाशक ठा० आनंद सिंह उमेद सिंह एंड संस, लाला बाजार अल्मोड़ा हैं। इस संग्रह में तीन भागों में कुल 31 कविता और गीत संगृहीत हैं। पहले भाग का नाम है ‘मिट्टी का मोह’। इस भाग में यौ तिरंगा मिलौ कफन, हमर देश मा, हमर पहाड़ मा आदि कुल 09 कविताएँ हैं। देशभक्ति इस भाग की विशेषता है। दूसरे भाग का नाम है ‘कसकता जीवन’। इस भाग में हम पीड़ लुकानैं रयां, हीरदी पीड़, ठोकर खानै, सुवा जून लैगै, हौंसिया आदि कुल 13 कविताएँ हैं। वेदना व करूणा इस भाग में मुखरित हुई है। तीसरे भाग का नाम ‘घाटी गूंजी जीवन झूमा है’। इस भाग में रूपसा रमूली, बाकरी, गाज्यौवा दिदी, आय हाय रे मिजाता आदि कुल 08 गीत संगृहीत हैं।

      राणा जी के इस संग्रह की कविताओं में वीर, श्रृंगार, करूण आदि रस प्रमुखता से मिलते हैं। आलंकारिकता व गीतात्मकता विद्यमान है। यह पुस्तक सामान्यतया बाजार में अनुपलब्ध है। इस संग्रह से ‘हम पीड़ लुकानै रयां‘ कविता की कुछ पंक्तियाँ दी जा रही हैंं-

दिन आनै जानै रया। 
हम बाटिकैं चानै रया। 
सांसो की धागिमा आंसों का। 
हम फूल गठ्यानै रया। 

बाजैं डाइम बासी घुघुति। 
जसि भुगति मैंल भुगति। 
बिन पाणिकै माछी जसी। 
पराणी तड़फानै रया। 

गरजी बाघइ जब सौणों की। 
मारि मारि बैंक गै घौणों की। 
हैंसी हैंसी बेर अपनी। 
हम पीड़ लुकानै रया। 

किताब का नाम- ‘प्योली और बुरांस’
विधा- कविता व गीत
रचनाकार- हीरा सिंह राणा
प्रकाशन वर्ष- 1987
प्रकाशक- ठा० आनंद सिंह उमेद सिंह एंड संस, लाला बाजार अल्मोड़ा
पुस्तक में संगृहीत राणा जी के लोकप्रिय गीत-

1. रूपसा रमूली घुङर न बजा छम-छम। 
जागिजा मठूमठू जौंला, किलै जैंछै चम चम। 

2. आलिली बाकरी लिली छ्यू छ्यू। 
   आलिली बाकरी लिली छ्यू छ्यू
    बाकरी ऐजा उज्याड़ न खा
    जोड़नू तिहाणि हाता…..। 

3. रंगीली बिंदी घागर काई 
    धोती लाल किनार वाई
   आय हाय हाय रे मिजाता

रचनाकार के विषय में-

 लोकगायक हीरा सिंह राणा

      पुस्तक के रचनाकार हीरा सिंह राणा उत्तराखंड के प्रख्यात लोकगायक हैं। राणा जी का जन्म 13 सितंबर,1942 को अल्मोड़ा जिले के ढडोली (मानिला) गांव में हुआ था। आपकी माताजी का नाम नारंगी देवी व पिताजी का नाम मोहन सिंह था। राणा जी की प्राथमिक शिक्षा मानिला में हुई। उन्होंने दिल्ली सेल्समैन की नौकरी की लेकिन इसमें उनका मन नहीं लगा और इस नौकरी को छोड़कर वह संगीत की स्कालरशिप लेकर कलकत्ता चले आए और संगीत की दुनिया में स्वयं को स्थापित किया। आपने ‘प्योली और बुरांस’ के अलावा ‘मानिलै डानि’ और ‘मनखों पड़्योव में’ गीत संग्रह भी लिखे हैं। 

       राणा जी का कुमाउनी लोकसंगीत को अतुलनीय योगदान रहा है। कई प्रसिद्ध गीतों की रचना आपने की और उन्हें अपने सुरीले स्वरों से सजाया। राणा जी ने कुमाउनी लोक संगीत को एक नई दिशा दी और उसे ऊचाँई पर पहुँचाया। आपने कुमाउनी लोकगीतों के ‘रंगीली बिंदी’, रंगदार मुखड़ी’, ‘सौमनों की चोरा’, ‘ढाई बिसी बरस हाई कमाल’, ‘आहा रे जमाना’ आदि कैसेट्स भी निकाले। आप कुमाउनी साहित्य मंडल, दिल्ली में लोककला निर्देशक के पद पर भी रहे। वर्तमान में आप दिल्ली सरकार की उत्तराखंड कला-संस्कृति अकादमी के उपाध्यक्ष हैं।

Share this post

Add a Comment

Your email address will not be published.

error: Content is protected !!