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पहाड़ की सौगात: काफल

पहाड़ की सौगात: काफल

      काफल उत्तरी भारत और नेपाल के पर्वतीय क्षेत्र, मुख्यत: हिमालय की तलहटी के 1200 से 2100 मीटर की ऊंचाई के जंगलों में पाया जाने वाला एक वृक्ष है। इसका वैज्ञानिक नाम ‘मिरिका एस्कुलेंटा (myrica esculata)’ है। ग्रीष्मकाल (चैत्र-बैशाख) में काफल के पेड़ पर लगने वाले फल पहाड़ी इलाकों में विशेष रूप से लोकप्रिय हैं। बाजार में काफल तीन सौ रूपये किलो तक बिकता है। 

काफल : स्वास्थ्य के लिए है लाभदायक

      काफल का फल गर्मी में शरीर को ठंडक प्रदान करता है। इसके फल को खाने से शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। आयुर्वेद में काफल को भूख की अचूक दवा बताया गया है। साथ ही हृदय और मधुमेह रोगियों के लिए भी यह रामबाण है। रक्तचाप को नियंत्रित करने की क्षमता भी काफल मेें होती है।

      काफल के फलों में एंटी-ऑक्सीडेंट के गुण होते हैं, जिनसे शरीर में ऑक्सीडेंटिव तनाव कम होता है और दिल सहित कैंसर एवं स्ट्रोक के होने की संभावना कम हो जाती है। काफल का जूस भी सेहत के लिए अत्यंत लाभकारी होता है। 

      काफल का फल ही नहीं वरन पेड़ भी अनेक औषधीय गुणों से भरपूर होता है। इसकी छाल का भी औषधि निर्माण में प्रयोग किया जाता है। इसकी छाल चर्मशोधन (टैंनिंग) में भी काम आती है। 

साहित्य में काफल

      काफल के विषय में कुमाउनी व हिंदी के आदि कवि लोकरत्न गुमानी पंत ने अपनी कविता में लिखा है-चित बिसारी सबै काफल राता भया। उत्तराखंड में काफल के संदर्भ में एक लोककथा ‘काफल पाको मैंल नि चाखो’ भी लोकप्रिय है।

     इसी तरह एक कुमाउनी लोकगीत ‘बेड़ूपाको बारामासा नरैण काफल पाको चैता मेरी छैला’ भी अत्यंत लोकप्रिय है। वर्तमान में कुमाउनी, गढ़वाली, नेपाली आदि भाषाओं में काफल संदर्भित अनेक गीतों की रचना हो रही है। 

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