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कुमाउनी कहानी संग्रह: बौधाण (Kumauni story Collection: Baudhan)

कुमाउनी कहानी संग्रह: बौधाण
Kumauni story Collection: Baudhan

        साथियों, क्या आप उस शख्सियत का नाम जानते हैं, जिसका कुमाउनी साहित्य की समृद्धि में अभूतपूर्व योगदान है ? आइये आज हम चर्चा करते हैं कुमाउनी के इसी कथाकार के कुमाउनी कहानी संग्रह ‘बौधाण’ के विषय में। ‘बौधाण’ कहानी संग्रह के लेखक हैं- डॉ. हयात सिंह रावत। आइये जानते हैं पुस्तक और लेखक के विषय में। 

कहानी संग्रह के विषय में-

बौधाण (कुमाउनी कहानी संग्रह)

       ‘बौधाण’ कहानी संग्रह कुमाउनी का प्रारंभिक कहानी संग्रह है। ‘बौधाण’ के पहले संस्करण का प्रकाशन 2005 में कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति, कसारदेवी (अल्मोड़ा) से हुआ। इसके लेखक साहित्यकार, संपादक डॉ. हयात सिंह रावत हैं। इस कहानी संग्रह में रावत जी की कुल 07 कहानियां संगृहीत हैं। ये कहानियाँ क्रमशः बराति पिठ्यां, बौधाण, बोधी, पस्टन, चिन-कुनव, रधुलि पगलि और तकदीर हैं। 

       ‘बौधाण’ की लगभग सभी कहानियाँ पर्वतीय समाज में व्याप्त सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक अंधविश्वासों पर गहरा व्यंग करती हैं। शीर्षक कहानी ‘बौधाण’ से पर्वतीय क्षेत्रों में पशुधन की महत्ता को दर्शाने वाला एक उदाहरण दृष्टव्य है-

“हमरि काइ में यतुक गुण भै, द्वि साल जाणै छकि बेर धिनाइ खवै हुनेर भै और दूद, घ्यू ले भलै भै। पुर परवारक पाल-बस्त, खर्च-पर्च काइ भैंसाक जुमला भै। नानतिनोंकि इस्कूल लिखाई-पढ़ाई सब तैकै वील चलि रै। भैंस ज कि छू, हमर मै बाब छू मै बाब।” (पृ० 23) 

किताब का नाम- ‘बौधाण’
विधा- कहानी
लेखक- डॉ. हयात सिंह रावत
प्रकाशक- कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति, कसारदेवी (अल्मोड़ा)
प्रकाशन वर्ष- 2005

लेखक के विषय में-

डॉ० हयात सिंह रावत

        डा0 हयात यिंह रावत का जन्म 11 अक्टूबर, 1955 में अल्मोड़ा जिले के लमगड़ा ब्लाॅक के मल्ला सालम पट्टी के झालडुंगरा नामक गाँव में हुआ। इनके पिता का नाम श्री इन्द्र सिंह रावत था और माता का नाम श्रीमती बचुली देवी था। रावत जी बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि के बालक थे। इनकी प्राइमरी शिक्षा प्राथमिक स्कूल झालडुंगरा में संपन्न हुई। कक्षा 6 व 7 तक की शिक्षा गाँव से 6-7 किमीटर दूर सरस्वती विद्यापीठ, बसंतपुर में और कक्षा 8 से 12 तक की शिक्षा सर्वोदय इण्टर कालेज, जयंती में प्राप्त की।

      इन्होंने हाईस्कूल 1971 में विज्ञान वर्ग से और इण्टर साहित्यिक वर्ग से 1973 में उत्तीर्ण की। इन्होंने 1974 में बी0टी0सी0 का प्रशिक्षण लिया और 1976 में कुमाऊं विश्वविद्यालय से बी0ए0 की परीक्षा उत्तीर्ण की। 1978 में इन्होंने एम0ए0 हिंदी विषय से पास किया और 1979 में बी0एड0 का प्रशिक्षण लिया। इन्होंने सन् 1980 में एम0एड0,1996 में एल0एल0बी0 और वर्ष 2005 में प्रो0 जगत सिंह बिष्ट के निर्देशन में कथाकार पानू खोलिया के साहित्य पर पी0एच0डी0 की।

    डा0 हयात सिंह रावत युवा अवस्था से ही सामाजिक,सांस्कृतिक और साहित्यिक गतिविधियों में प्रतिभागिता करते थे। इन्होंने कक्षा 11 में पढते समय गांव में युवक मंगल दल की स्थापना की। युवक मंगल दल के माध्यम से उन्होंने तमाम सामाजिक कार्य सम्पन्न किए। 1974 में इन्होंने स्थानीय लोगों के सहयोग से रामसिंह धोनी विद्यापीठ झालडुंगरा की स्थापना की। वर्तमान में यह विद्यालय हाईस्कूल (राजकीय) बन चुका है। 1992 में रावत जी ने क्षेत्रीय समस्याओं के समाधान हेतु मल्ला शालम संघर्ष समिति का गठन किया। इस समिति के द्वारा रावत जी ने तमाम ग्रामीण समस्याओं के समाधान के प्रयास किए। इस दौरान आजीविका हेतु रावत जी ने शिक्षक, एल0आई0सी0 एजेंट आदि पदों पर काम किया।

      रावत जी जब इंटर में पढ़ते थे तभी से इन्होंने पत्रकारिता में प्रवेश कर लिया था। 26 जनवरी, 1978 से इन्होंने ‘हिलाँस साप्ताहिक‘ पत्र का सम्पादन कार्य शुरू किया। हिलाँस का सम्पादन उन्होंने 1992 तक जारी रखा। एल0एल0बी0 करने के बाद इन्होंने आजीविका हेतु वकालत शुरू की, जो आज भी जारी है। वर्ष 1999-2000 में इन्होंने अग्रणी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रामसिंह धौनी पर आधृत ‘राम सिंह धौनी स्मारिका‘ का सम्पादन किया।

      रावत जी कुमाउनी भाषा, साहित्य और संस्कृति के विकास हेतु सदैव तत्पर रहते हैं। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु उन्होंने कुछ समर्पित सहयोगियों के साथ मिलकर कुमाउनी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति प्रचार समिति, कसारदेवी, अल्मोड़ा की स्थापना की। इसी के माध्यम से उन्होंने नवंबर, 2008 से एक कुमाउनी मासिक पत्रिका ‘ पहरू ‘ का संपादन शुरू किया। वर्तमान में भी यह पत्रिका निरंतर प्रकाशित हो रही है और कुमाउनी साहित्य के विकास में अपना अग्रणी योगदान दे रही है। पत्रिका के माध्यम से रावत जी तमाम नये पुराने रचनाकारों को कुमाउनी में लिखने हेतु प्रोत्साहित करते रहते हैं। वे साल में एक बार राष्ट्रीय कुमाउनी भाषा सम्मेलन का आयोजन भी करवाते हैं। 

      रावत जी ने कुमाउनी में क्वीड़ (कुमाउनी का प्रथम निबंध संग्रह) और ‘बौधाण (कुमाउनी कहानी संग्रह) नामक पुस्तकें भी लिखी हैं। क्वीड़ साल 2000 में प्रकाशित हुई और बौधाण 2005 में। इसके अलावा इन्होंने वर्ष 2013 में कुमाउनी यात्रा-वृतांत संग्रह ‘सफर‘ का संपादन भी किया। इनके अलावा ‘ कथाकार पानू खोलिया: व्यक्तित्व एवं कृतित्व’ नाम से इनका एक शोध प्रबन्ध भी वर्ष 2014 में प्रकाशित हो चुका है।

     डा0 हयात सिंह रावत को उनके साहित्यिक, सामाजिक, सांस्कृतिक कार्यों हेतु आदित्य राम नवानी लोक भाषा सम्मान (2011) हिलाँस अवार्ड (2013), साहित्य प्रभा सरस्वती रत्न सम्मान (2014) आदि सम्मान प्राप्त हो चुके हैं।

      कुमाउनी भाषा में ‘पहरू‘ के प्रकाशन के विषय में उनका कहना है कि कुमाउनी भाषा में साहित्य की सभी विधाओं में रचनाएं सामने लाने के उद्देश्य से पहरू का प्रकाशन शुरू किया, ताकि कुमाउनी भाषा भी अन्य भाषाओं के समकक्ष एक समृद्ध भाषा के रूप में खड़ी हो सके।

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