साथियों, देश में कोरोना वायरस की तीसरी लहर का खतरा बना हुआ है। इसलिए हम सभी को सजग रहने की जरूरत है। वैक्सीन जरूर लगायें और कोविड नियमों का पालन करें। तभी हम स्वयं की व दूसरों की सुरक्षा कर पाने में सक्षम हो पायेेंगे।

आखिर क्यों चर्चा में है ‘छह साल की छोकरी’ ? जानिए विशेषज्ञों की राय।

छह साल की छोकरी: बहस के दायरे में

     NCERT की कक्षा-1 की हिंदी की किताब ‘रिमझिम’ की ‘छै साल की छोकरी’ कविता को लेकर सोशल मीडिया में जोरदार बहस छिड़ गई है। कुछ लोग तो बिना कवि और उसके कालखंड को जाने टिप्पणी कर रहे हैं। यह कविता कवि रामकृष्ण शर्मा खद्दर की रची हुई है और खद्दर साहब 1916 से 1975 के कालखंड के दिल्ली से संबद्ध कवि रहे हैं। 

वर्ष 2006 से पाठ्यक्रम में-

यह कविता वर्ष 2006 से NCERT की कक्षा-1 की हिंदी की पुस्तक ‘रिमझिम’ के पाठ्यक्रम का तीसरा पाठ है। अब 14 साल बाद इस कविता पर सोशल मीडिया में जोरदार बहस छिड़ गई है। 

पाठ्यपुस्तक की कविता-

छह साल की छोकरी,
भरकर लाई टोकरी।
टोकरी में आम हैं,
नहीं बताती दाम है।
दिखा-दिखाकर टोकरी,
हमें बुलाती छोकरी।
हम को देती आम है,
नहीं बुलाती नाम है।
नाम नहीं अब पूछना,
हमें आम है चूसना।

रचनाकार रामकृष्ण शर्मा खद्दर-

     रामकृष्ण शर्मा खद्दर का जन्म दिल्ली में वर्ष 1916 में हुआ था। खद्दर जी एक शिक्षक रहे हैं और अपनी इन्हीं कविताओं के कारण बच्चों के बीच खासे लोकप्रिय रहे हैं। खद्दर जी का निधन 12 फरवरी 1975 को हुआ था। खद्दर जी हिंदी के प्रारंभिक बाल कवियों में आते हैं। इस कविता के अलावा उन्होंने गुलगुला, लड़े नकलची राजा, आलू की पकौड़ी, मेरे खेल आदि कविताएँ भी लिखी हैं। खद्दर जी की एक और कविता-

छुट्टी हुई खेल की,
चढ़ी कढ़ाही तेल की।
सुर-सुर उठता बुलबुला,
छुन-छुन सिकता गुलगुला।
भुलभुला और पुलपुला,
मीठा-मीठा गुलगुला।    

कविता चर्चा में क्यों-

     यह कविता छत्तीसगढ़ कैडर के 2009 बैच के IAS ऑफिसर अवनीश शरण की वायरल टिप्पणी के बाद चर्चा में आई है। इस कविता के विषय में उन्होंने लिखा है- “यह किस सड़कछाप कवि की रचना है? कृपया इसे पाठ्यपुस्तक से बाहर करें।” 

कविता की विशेषताएँ-

1. बाल मनोविज्ञान की रूचिकर कविता- 

     यह बाल मनोविज्ञान को ध्यान में रखकर लिखी गई रूचिकर कविता है, जो बहुत ही सटीक कक्षा के विद्यार्थियों के पाठ्यक्रम में रखी गई है। कक्षा 1 के विद्यार्थी को आप ऐसी ही कवि पढ़ाएंगे जो विद्यार्थी को गुनगुनाने, झूमने पर मजबूर करे।

2. बच्चों के बचपन की कविता- हम कक्षा 1 में पढ़ने वाले बच्चे को महान आदर्शों की कविता नहीं पढ़ा सकते। उसके मष्तिक में ढेर सारी सूचनाएं नहीं भर सकते हैं। यदि हम ऐसा करते हैं तो बच्चों का का बचपन उनसे छीनते हैं। हमें उन्हें अपना बचपन जीने देना चाहिए। यह कविता बच्चों को बचपन का एहसास दिलाने वाली कविता है। 

कविता का विवादास्पद पक्ष-

1. कविता में प्रयुक्त छोकरी शब्द-   

     इस कविता में आये छोकरी शब्द पर अधिकांशतः सवाल उठाये जा रहे हैं। छोकरी शब्द लोकभाषा का शब्द है। ब्रजभाषा में छोरा, छोरी शब्द बहुतायत में प्रयुक्त होते हैं, जो शैशवकालीन लड़का, लड़की के समानार्थी हैं। इसी तरह छोकरी शब्द भी शैशवकालीन लड़की के लिए प्रयुक्त होने वाला एक खूबसूरत शब्द है। छोरी, छोकरी, छोकड़ी, छ्योड़ि, छ्वोरी, लड़की सब पर्यायवाची शब्द हैं। हिंदी की डिक्शनरियों में छोकरी या छोकड़ी का अर्थ ‘लड़की’ बताया गया है। अगर यह शब्द इतना वर्जित होता तो इस शब्द का कुछ और अर्थ भी शब्दकोशों में जरूर मिलता। 

      यहाँ यह बात गौर करने योग्य है कि यह कविता 1975 से पहले ही लिखी गई होगी, क्योंकि 1975 में कवि का निधन हो गया था। यद्यपि वर्तमान में छोकरी शब्द के मायने बदल गए हों, किंतु कविता में कवि ने ‘छोकरी’ शब्द को छोटी लड़की के संदर्भ में ही लिया है।

2. बाल मजदूरी को प्रोत्साहन-

    कुछ लोग इस कविता पर बाल मजदूरी/बाल श्रम के प्रोत्साहन का आरोप लगा रहे हैं। 

3. कविता के द्विअर्थी भाव-

      कुछ लेखक, लेखिकाएं व लोग कविता पर द्वि-अर्थी भाव का आरोप लगा रहे हैं।कविता के भाव इस प्रकार हैं, जिसमें द्विअर्थी होने का कोई प्रश्न नहीं उठता- इस कविता में सिर पर टोकरी रखकर आम बेचती एक छह साल की बच्ची के मनोभावों का चित्रण किया गया है। कवि कहता है कि एक छह साल की बच्ची टोकरी में आम रखकर बेच रही है, किंतु उनका दाम नहीं बताती। वह आम से भरी टोकरी सबको दिखाकर अपने पास बुला रही है। वह लड़की सबको आम तो दे रही है, पर अपना नाम नहीं बता रही है। कवि कहता है कि अब हमें उस बच्ची का नाम नहीं पूछना। अब तो हमें केवल रसीले आम चूसने हैं।

क्या कहती हैं महिला विमर्श से जुड़ी लेखिकाएं- 

1. सुजाता चोखेरबाली- 

     आप भूल जाते हैं कि सामाजिक सच्चाइयाँ तय करेंगी साहित्य का पाठ। आप भूल गए कि बच्चियों के रेप होते हैं।भूल गए कि 4 साल के बच्चे ने इसी उम्र की क्लासमेट के वजाइना में पेंसिल डाली थी! भूल गए कि चारों तरफ़ गालियाँ और द्विअर्थी संवाद इन्हें भी सुनाई देते हैं !

    आपने कहा बाल श्रम होता ही है। कविता में 6 साल की छोकरी दिख गई तो समाज का सच ही तो है। तब फिर छोकरी को बर्तन माँजते दिखा देते! डीयू के टॉप संस्थान से बी.एड. किया है मैंने जो सीखा उसके आधार पर कहती हूँ मुझे कविता का कोई संदेश दिखाई नहीं देता!

    अगर कविता का उद्देश्य मनोरंजन था तो मनोरंजन करने वाले का जेंडर फ़ीमेल होगा इस धारणा पर कविता को आघात करना चाहिए था। 6 साल का छोकरा कर दीजिए पूरी कविता में और अब पढ़िए। पर्फ़ेक्ट है! अब पूछिए सवाल बच्चों से! और मुझे आपसे पूछने दीजिए कि क्या अच्छे साहित्य का अभाव हो गया है। 

      जो आपको मजबूरी में एक औसत से नीचे की कविता पाठ्यक्रम में लगानी पड़ी जिसे इतना डिफ़ेंड भी करना पड़ रहा है? कोई कह रहा है 6 साल का बच्चा मासूम होता है तो उसे बाल श्रम जैसी भयानक चीज़ क्यों बता रहे हैं? दिल तोड़ने के लिए उसका? फिर तो ठीक से बताइए आँकड़ों के साथ कि कैसे पटाखों की फ़ैक्ट्री में बच्चे बीमारियों के शिकार होते हैं मरते हैं, उनका श्रम सस्ता माना जाता है! बताएँगे 6 साल के बच्चे को? 

      जिन्हें सूरज चाँद तितली पढ़ाना था, जिनके दिमाग़ से जेंडर स्टीरियोटाइप की रूढ़ छवियाँ हटानी थी उन्हें आपने बाल श्रम या पता नहीं मनोरंजन के नाम पर कूड़ा दिया आपको ख़ुद नहीं पता। और हाँ, छोकरी! पाठ्य पुस्तकें मानक हिन्दी में बनती हैं और जिस आयु वर्ग के बच्चों को भाषिक विविधता बतानी होती है उसे शिक्षण उद्देश्यों में लिखा जाता है। पहली कक्षा में ही आप ग्रेजुएशन का ज्ञान नहीं देने लगते। तुलसी या मीरा पढ़ा देंगे? वर्ग अंतर का कोई होश नहीं है? आप एक 6 साल अमीर बच्चे को पढ़ाइए मज़ाक़ उड़ाएगा क्लास में ! वह मिडल फ़िंगर दिखाने और f शब्द की गाली से भी परिचित है। अब आप क्लास 1 के बच्चों से विमर्श कीजिए जो आप यहाँ कर रहे हैं। फिर वे आपको बताएँगे कि कविता कितने काम की है! 

       सरकारी स्कूलों में पढ़ाया है, जानती हूँ बच्चियाँ रोटी बनाती हैं, छोटे भाई-बहनों की माँ बन जाती हैं, मार खाती हैं, हरासमेंट झेलती हैं, उन्हें यह कविता क्या देती है? उनके लिए समाज कैसे बदलती है यह कविता? उनके प्रति किसे सेन्सिटिव बनाती है? आपने तो टीचर की सदिच्छा, उसकी ख़ुद की जेंडर अवधारणा (जो पता नहीं क्या है) पर छोड़ दिया! गाँव देहात ही नहीं शहरी स्कूलों के अध्यापक भी जेंडर पूर्वाग्रहों से मुक्त नहीं होते! आप उन्हें वह सामग्री दीजिएगा जिसके बारे में यह तय करना भारीपड़ रहा है कि sexual connotation है या नहीं? 

    ख़ैर, आप समझो मत समझो बच्चियाँ समझती हैं. अपनी दस साल की बेटी को बिना कुछ बताए मैंने कविता सुनाई और वह तपाक से बोली- चाइल्ड लेबर और जेंडर पॉर्शीऐलिटी मम्मा! सोचिए, झुग्गी में रहती या गाँव की कोई बच्ची जो सब देखती, समझती है उसके लिए कितनी अफ़ेंडिंग है! कुल मिलाकर, इस कविता को बचाने का हर तर्क समझ से परे है। 

2. ममता कालिया-

     सीधी सी बात है यह bad poetry का उदाहरण है। बच्चों के लिए एक से बढ़ कर एक कविताएं एकतारा और तक्षशिला प्रकाशन के पास हैं। नरेश सक्सेना, स्वयंप्रकाश और अनिरुद्ध उमट ने बच्चों की बेहद दिलचस्प कविताएं लिखी हैं। पाठ्यक्रम समिति में जानकार लोग हों तभी सही काम हो सकता है। यह खराब रचना है। 

लेखिकाओं के विषय में- सुजाता चोखेरबाली दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापिका व लेखिका हैं। तीन पुस्तकें आपने लिखीं हैं। ममता कालिया हिंदी की सुप्रसिद्ध कथाकार हैं। अनेक पुस्तकें आपने लिखी हैं।

क्या कहती है एनसीईआरटी-

    इस कविता पर हुए विवाद के बाद NCERT ने निम्न बातें कही हैं-

    एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तक में दी गई कविताओं के संदर्भ में: एन.सी.एफ-2005 के परिप्रेक्ष्य में स्थानीय भाषाओं की शब्दावली को बच्चों तक पहुँचाने के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए ये कविताएं शामिल की गई हैं ताकि सीखना रुचिपूर्ण हो सके।

क्या कहते हैं उत्तराखंड के विषय विशेषज्ञ-

1. नंदकिशोर हटवाल-

      असल में इस कविता में और कोई दिक्कत नहीं, बस बोली, लोक, स्थानीय और आमजन द्वारा प्रयोग में लायी जानें वाली भाषाओं और देशज शब्दों को कमतर समझने की प्रवृत्ति की दिक्कत है। इस कविता में छोकरी की जगह कन्या, सुकन्या, बाला, बालिका, बाले होता तो कविता उत्कृष्ट हो जाती। यह शुद्धतावाद का मामला है। इस धारणा के चलते हमें देशज शब्द खटकते हैं। यह एक बच्चे के भाषाई विकास के साथ स्थानीयता और इस वर्ग के बच्चों से जुडाव में भी बाधक है। ncf 2005 में स्थानीय भाषा बोली तथा उनके शब्दों को सम्मान देने की बात साफतौर पर कही गयी है। इस कविता की विशेषता इसकी विषय वस्तु ‘श्रम करती बच्ची’ भी है। हमें फूल और तितलियों की कोमल कविताओं से बाहर आना होगा। बेहतर पोषण के लिये कुछ ऐसी खुरदरी कविताओं को भी परोसना होगा।

    बच्चों की कविता और साहित्य को लेकर एक दिक्कत ये भी है कि हम उसे अपने (बड़ों के) नजरिये से देखते हैं। किसी शब्द का कोई दूसरा अश्लील अर्थ या दोअर्थ सिर्फ हमारे दिमाग में है और ये कविता हमारे लिये है ही नहीं। बच्चो के लिये है। इसलिए हमारी पसंद नापसंद ज्यादा मायने नहीं रखती। 

       पाठ्यपुस्तक में सम्मिलित कविता के अलग संदर्भ भी होते हैं। वो सिर्फ एक स्वतंत्र कविता नहीं रह जाती है। उसके साथ कक्षा, उम्र, पाठ्यक्रम, उसकी अवधारणा, ncf, अगले-पिछ्ले पाठ, पाठ्य विषय, सीखने के प्रतिफल आदि बहुत सारे संदर्भ जुड़े होते हैं। साथ में एक अदद शिक्षक भी होता है। कविता पर चर्चा तो ठीक बात है पर बहुत जल्दबाजी में एक-आध शब्दों को पकड़ कर कविता को खारिज कर देना शायद उचित नहीं होगा।

2. मनोहर चमोली-

     मुझे लगता है कि हमें भाषा की कक्षा के हिसाब से इस कविता को देखना चाहिए। बहुभाषिकता के लहज़े से भी शब्दों के विविध अर्थ को भी समझना भाषा की कक्षा के लिए आवश्यक है। बहुभाषी भारत में तो चार कोस में वाणी बदल जाती है। ऐसे में हमें समानार्थी शब्दों के हिसाब से छोकरी शब्द को लेना ही होगा। 

      हमें यह भी बताना होगा और मानना होगा कि कई शब्द देशज स्तर पर स्वीकार्य हो सकते हैं लेकिन संभव है उसे दूसरे प्रांत में अन्यथा लिया जाता होगा। शब्दभंडार की वृद्धि के लिहाज से भी हमें रूढ़िवादिता से बाहर आना होगा। एक अच्छा शब्दकोश कौन-सा होता है? ज़ाहिर है वही जिसमें वर्जित, अवांछित और तथाकथित आम बोलचाल की भाषा से इतर शब्दों को भी जगह दी जाती है। 

     हमें संकीर्णता और अति क्षेत्रीयता के स्तर पर स्वयं निर्णायक नहीं हो जाना चाहिए। बुनियादी स्कूल में पढ़ाने वाले शिक्षकों में भी संभव है कि छोकरी शब्द को लेकर असहमति है। वे अपनी असहमति कक्षा में व्यक्त करे। कौन रोकता है? अति शुद्धतावादी नज़रिए से हमें बचना चाहिए। भाषा की कक्षा में आंचलिकता के आधार पर शब्दों के साथ लचीला रवैया रखना ज़रूरी है। हम इसे केवल इस तौर पर क्यों लें कि छोकरी शब्द से कक्षा बिगड़ जाएगी। 

      क्या हमें यहां अनुवाद की संभावना नहीं दिखाई देती? छोकरी के समकक्ष शब्द भंडार की संभावना नहीं दिखाई देती? भिन्न-भिन्न भाषाओं में किन्ही शब्दों को क्या कहा जाता है? इस पर आगे नहीं बढ़ा जा सकता? वाक्य निर्माण में जल,नीर,पानी के प्रयोग से भाषाई कौशलों के विस्तार की समझ नहीं बढ़ाई जा सकती? फिर भी असहमति का स्वागत तो किया ही जाना चाहिए।

3. महेश पुनेठा-

      ‘आम की टोकरी’ कविता को लेकर, जो बहस सोशल मीडिया में चल रही है, दरअसल यह एक कविता को लेकर होने वाली बहस मात्र नहीं है, बल्कि शिक्षा, शिक्षण, बालमन, भाषा और बाल साहित्य को लेकर जो दो धारणाएं हैं- पहली परंपरागत धारण और दूसरी आधुनिक धारणा उन दो धारणाओं के बीच की बहस है।

     समाज का एक बड़ा वर्ग अभी भी शिक्षा को पारंपरिक धारणा से ही देखता है। पिछले 100 सालों में शिक्षा में हुए नए प्रयोगों से उसका परिचय बहुत कम दिखाई देता है। यह कहना गलत नहीं होगा कि शिक्षा की परंपरागत अवधारणा समाज के सामंती मूल्यों से संचालित रही है जबकि आधुनिक धारणा लोकतांत्रिक मूल्यों से। लेकिन लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में रहते हुए भी, अभी समाज के बहुसंख्यक लोगों की सोच लोकतांत्रिक नहीं हो पाई है। वे पुरानी धारणाओं के आधार पर ही समाज, संस्कृति, शिक्षा और साहित्य का विश्लेषण करते आ रहे हैं जिसे हम इस कविता के विश्लेषण में भी साफ-साफ देख सकते हैं। 

      जो लोग देश दुनिया में शिक्षा में नए प्रयोगों से परिचित हैं और स्वयं बच्चों के साथ काम करते हुए नए-नए प्रयोग कर रहे हैं वे इस कविता को अलग ढंग से देख रहे हैं और जो इस सब से अनभिज्ञ हैं वे दूसरे ढंग से देख रहे हैं। हमें यह समझना होगा कि आज शिक्षा और शिक्षण, शिक्षक केंद्रित न होकर बाल केंद्रित हो गया है। आज भी यदि बच्चे को मिट्टी का लौंदा या खाली घड़ा मानते हुए पाठ्यचर्या, पाठ्यक्रम और पाठ्यवस्तु का विश्लेषण करेंगे तो निश्चित रूप से इनमें हमें बहुत सारी दिक्कतें दिखाई देंगी। जैसा कि बहुत सारे शिक्षकों के साथ बात करते हुए हमें बहुत बार दिखाई देती भी है। 

    वे शिक्षक जो शिक्षा की इस नई अवधारणा से परिचित नहीं है उन्हें एन सी एफ- 2005 के आलोक में तैयार पाठ्य पुस्तकों में बहुत सारी आपत्तिजनक बातें नजर आती हैं जब शिक्षकों की स्थिति ऐसी है तो गैर शिक्षक की क्या होगी,समझा जा सकता है।यह एक अच्छा अवसर है, जब इस कविता के बहाने शिक्षा की नई अप्रोच पर बातें की जा सकती हैं।

     दुनिया भर के प्रयोग उनको न भले भारत में शिक्षा के क्षेत्र में जो नए प्रयोग महात्मा गांधी, गिजूभाई रवींद्रनाथ टैगोर, जे कृष्णमूर्ति, डेविड आसबोरो,दादा धर्माधिकारी जैसे शिक्षाविदों और एकलव्य, दिगंतर जैसी संस्थाओं द्वारा किए गए हैं, उन्हें पढ़ा-समझा जाए ।

     प्रो0 कृष्ण कुमार के मार्गदर्शन और प्रो0 यशपाल की अध्यक्षता में तैयार एन सी एफ- 2005 के विभिन्न दस्तावेजों का अध्ययन किया जाए उन पर बात की जाए। एकलव्य द्वारा प्रकाशित किताबें भी शिक्षा की नई अवधारणा को समझने में हमारी बहुत मदद कर सकती हैं। इस दिशा में शिक्षकों ही नहीं समाज के विभिन्न तबकों के साथ काम करने की आवश्यकता है। 

4. रेखा चमोली-

          मैं प्राथमिक स्कूल में काम करती हूं और मैंने अपने स्कूल के बच्चों के साथ इस कविता पर बहुत बार काम किया है। कविता को उसके चित्र के साथ देखने पर पहला अनुमान यह लगता है कि बच्चे खेल रहे हैं और एक लड़की आम बेचने का अभिनय कर रही है। बड़ी प्यारी और खुश लग रही है। अमूमन सभी बच्चे अपने खेल में इस तरह का अभिनय करते हैं। रेलगाड़ी चलाना या जानवरों की आवाजें निकालना आदि। यह एक मजेदार कविता है। 

      बच्चे इस तरह की कविताएं पसंद करते हैं जो तुकांत हो,जिनमें शब्द चयन सरल हो और जो उनके आसपास के जीवन और अनुभवों से मेल खाती हो, जिसपर वे आपस में बात कर सकें, अपने शिक्षक से बात कर सकें । पहली कक्षा के बच्चे जो 5 साल पूरा कर स्कूल में आ रहे होते हैं इस उम्र में होते हैं जहां उन्हें शब्दों से खेलना पसंद होता है। अक्खड़ बक्कड़ बमम्बे बो जैसी तुकबन्दी वाली कविता जो सालों से बच्चों को प्रिय है, इसका सबूत है कि बच्चे अपने भाषाई विकास में किस तरह शब्दों को तोड़ मरोड़ कर मजा लेते हैं और नए शब्द सीखते हैं। 

        आम की टोकरी भी इसी तरह की एक कविता है। बेशक इससे बेहतर और भी कविताएं बच्चों के लिए लिखी हुई हैं लेकिन पाठ्यक्रम की अपनी कुछ विशेष मांगें होती हैं, उनके अनुसार कविता का चयन करना होता है। इसमें सभी कविताओं तक पहुंच न होना भी एक मसला हो सकता है। 

       इन दिनों कविता को लेकर बहस छिड़ी हुई है। कितनी अच्छी बात है न बच्चों की पाठ्यपुस्तक की सामग्री को लेकर बहस होना । क्या सच में हम अचानक इतने जागरूक और पढ़े लिखे हो गए हैं ? क्या हमने बाल मनोविज्ञान, ncf, शिक्षा नीतियों की सिफारिशों और स्कूली शिक्षा में आए नवीन बदलाओं को जानना समझना शुरू कर दिया है ? हमने देश विदेश की स्कूली शिक्षा के बारे में पढ़ सुन लिया है और अब हम अपनी शिक्षा व्यवस्था में सचेत होकर अपनी भागीदारी करने वाले हैं या ये सब टिप्पड़ियां बस यूं ही हैं। इस पर थोड़ी देर रुककर सोचने की जरूरत है। 

         खारिज करना बहुत सरल है बशर्ते खारिज करने के तर्क उन मानकों को ध्यान में रखकर किए जाएं जिनके आधार पर कोई कविता कहीं उपयोग हुई है। खैर ये बहस बहुत लंबी जा सकती है। कोई भी बात हर किसी को अच्छी नहीं लग सकती। न ही हर व्यक्ति बाल मनोविज्ञान को समझने की समझ रख सकता है। न ही वह बच्चों के प्रति प्रेमिल और संवेदनशील हो सकता है। अगर ऐसा होता तो हमारे आसपास किसी भी तरह के बाल अपराध न होते। लेकिन हर अभिभावक का यह अधिकार है कि वह अपने बच्चे के स्कूल और पाठ्यक्रम के बारे में जाने समझे। 

      हम अपनी पाठ्यपुस्तक में महान आदर्शों से भरी और खुशहाली की सामग्री देखने के आदी हो गए हैं खासतौर पर छोटे बच्चों की किताबों में। जबकि छोटे बच्चे अपनी किताब में मजेदार चीजें पढ़ना चाहते हैं जिसे पढ़ना उन्हें अच्छा लगे। विशेषज्ञ भी कहते हैं कि छोटे बच्चों की पठन सामग्री ऐसी होनी चाहिए जो उन्हें स्वयम पढ़ने के लिए प्रेरित करे। इस तरह की सामग्री तक बच्चों की पहुंच जल्दी होती है। 

       अगर हम कक्षा 1 व 2 की पठन सामग्री देखेंगे तो हमें बच्चे, जानवर और प्रकृति पर आधारित पाठ दिखेंगे। यहां तक कि एक पाठ में बल्ले और गेंद की कहानी भी है। जाहिर सी बात है बच्चों के लिए उनके मनपसंद पात्र रखे गए हैं। ताकि बच्चों को अपनी किताब अच्छी लगे। वे उसे अपनी इच्छा से देखना पढ़ना चाहें। 

        कविता में आए जिन दो शब्दों पर सबसे अधिक बहस हो रही है उनमें पहला शब्द है छोकरी। पश्चिम उत्तर प्रदेश में यह शब्द छोटी बच्ची के लिए उपयोग में लाया जाता है। शायद और जगह भी होता हो। जबकि कुछ जगहों पर यह शब्द थोड़ा बदलकर ऐसी बच्ची के लिए कहा जाता है जिसके पिता न हों। हर जगह के ऐसे खास शब्द हैं। बहुभाषिकता से समृद्ध हमारे देश में ऐसे कई शब्द होंगे जिनसे सभी लोगों की सहमति न हो। लेकिन हमें उन शब्दों का सम्मान करना भी सीखना होगा। उनको जगह देनी होगी। 

        चूसना शब्द पर अश्लीलता का आरोप लग रहा है। क्या सोच रहे हैं ? ऐसा सोचने वाले। हद है। बच्चा सबसे पहले अपने जीवन में जो क्रिया सीखता है वह है माँ का दूध पीना। इस प्रक्रिया को चूसना कहते हैं। खाने पीने को लेकर हमारे पास बहुत से शब्द हैं खाना, चबाना, चूसना, निगलना आदि आदि। आम चूसते नहीं हैं क्या ?? खासकर बच्चों को तो इसी तरह आम खाना अच्छा लगता है। बहुत बार उन्हें बाद बाद में आए आमों में पाए जाने वाले कीड़ों के डर के मारे आम काट कर खाने को कहा जाता है। 

     वयस्कों से अनुरोध है कि वे अपनी घटिया सोच को बच्चों के ऊपर न थोपें। बच्चे उनसे बहुत अधिक समझदार होते हैं। बहुत बारीकी से अपने आसपास की चीजों और घटनाओं को देखते हैं । उसका प्रभाव उन पर पड़ता है। संभव हो तो अपने आसपास को , अपने घर परिवार को हर तरह से बच्चों के लिए सुरक्षित और समृद्ध बनाने में मदद करें। 

     कविता के साथ शिक्षक के लिए भी निर्देश दिए हैं कि उन्हें इस कविता को किस तरह बरतना है। इस कविता में सुनना, बातचीत करना, पढ़ना, लिखना के साथ साथ लड़की के लिए प्रयुक्त शब्द, उनके आसपास पाए जाने वाले फल, उनके द्वारा घर परिवार में की जाने वाली मदद, जेंडर, बालश्रम, स्कूल से बाहर छुटे बच्चे आदि कई मसलों पर बात की जा सकती हैं। इस तरह से यह एक उपयोगी कविता है। बिल्कुल यह सर्वोत्तम कविता नहीं है। इससे बेहतर कविताएं भी हैं। मुझे पूरी उम्मीद है इस बहस के बाद जागरूक हुए शिक्षक व माता पिता अपने बच्चों के लिए उन कविताओं को ढूंढेंगे और उन्हें बच्चों को पढ़ाएंगे। कवि लेखक बच्चों के लिए कविताएं लिखेंगे। 

     बेशक बच्चे कोमल मन के होते हैं लेकिन उनके आसपास की दुनिया उतनी कोमल और संवेदनशील नहीं होती। इसलिए जरूरी है कि उनकी किताब में ऐसे तमाम मुद्दे हों जिनपर उनके साथ सही समझ और दिशा के साथ काम किया जा सके। उनकी इधर उधर से बनी समझ को प्रश्न और तर्क के साथ उनकी बात सुनकर सही तथ्यों से उन्हें परिचित कराया जाए। एक अच्छा और सचेत शिक्षक अपनी कक्षा में ऐसा करता है। 

      अगर हमें बच्चों को जेंडर, स्त्री हिंसा, बाल श्रम आदि चीजों को लेकर जागरूक बनाना है तो इस तरह की कविताओं का स्वागत करना होगा जिसकी मदद से उनसे इन मुद्दों पर बात कर सकें। उनसे इन मुद्दों को छिपाकर कोई बात नहीं हो सकती। 

       हमें बच्चों को अपने देश की बहुभाषिकता और बाकी बच्चों के साथ हो रहे बर्तावों से भी परिचित कराना होगा। अपने से अलग सामाजिकता और हैसियत के बच्चों के बारे में जानना अन्य बच्चों के लिए बहुत जरूरी है। उनकी होने वाली दिक्कतों और रोजमर्रा के कामों में उठाए गए जोखिमों के बारे में जब बच्चे जानेंगे तभी उनके लिए संवेदनशील होंगे।

     एक ही शब्द अपने उपयोग और बोलने वाले की सोच की वजह से अपने नए अर्थ के साथ बरतता है , समय के साथ बच्चे यह भी समझ जाएंगे। फिलहाल कक्षा में उसका सही उपयोग करना बच्चा सीखेगा ऐसा मैं मान रही हूं। 

      छोटे बच्चे सिर्फ किसी और का काम करने या बाल मजदूरी जैसी चीजों के लिए ही काम नहीं करते। बल्कि कई बार बच्चे अपने आप घर के कामों में छोटी छोटी मदद करते हैं। और बच्चों को सहज रूप से अपनी क्षमतानुसार अपने लायक काम सीखने में कोई बुराई नहीं है। बालश्रम के अलावा इस कविता को ऐसे भी देख सकते हैं। 

      बाबजूद उपरोक्त बातों के यह कविता बहुत सी अन्य बातों के लिए जगह बनाती है। ये अच्छी बात है कि इस कविता के बहाने तमाम तरह के नए मुद्दे बच्चों की पाठ्यसामग्री को लेकर उठ रहे हैं। आगे के कामों में ये मुद्दे मदद करेंगे। 

विशेषज्ञों के विषय में- ये सभी विशेषज्ञ उत्तराखंड के हैं और शिक्षा व शैक्षिक संदर्भों पर गहरी पकड़ रखते हैं। नंदकिशोर हटवाल शिक्षक, प्रसिद्ध लेखक व कवि हैं। उनकी ‘बोये जाते हैं बेटे और उग आती हैं बेटियाँ’ कविता अत्यधिक चर्चित रही है। महेश पुनेठा शिक्षक व कवि हैं। दीवार पत्रिका पर आपका विशेष कार्य है। आप शैक्षिक दखल पत्रिका के संपादक भी हैं। मनोहर चमोली शिक्षक व प्रसिद्ध बाल साहित्यकार हैं। रेखा चमोली कवयित्री व शिक्षिका हैं। पेड़ बनी स्त्री, मेरी स्कूल डायरी पुस्तकों का लेखन आपने किया है। आप सभी एस. सी. ई. आर. टी. अथवा एन. सी. ई. आर. टी. की पाठ्यक्रम निर्माण समिति से जुड़े रहे हैं।

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