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सोरघाटी के लोकजीवन का दस्तावेज: सोर की लोक थात

     प्रिय पाठकों, आज हम आपको ले चलते हैं मिनी कश्मीर कहे जाने वाले सीमांत जनपद पिथौरागढ़ की ओर और चर्चा करते हैं पद्मादत्त पंत द्वारा लिखित पुस्तक ‘सोर की लोक थात’ के विषय में। 

पुस्तक के विषय में-

सोर की लोक थात

       ‘सोर की लोक थात’ पुस्तक के लेखक पद्मादत्त पंत हैं। इस पुस्तक का पहला संस्करण वर्ष 2010 में नवोदय पर्वतीय कला केंद्र, पिथौरागढ़ से प्रकाशित हुआ है। इस पुस्तक की भूमिका डॉ. राम सिंह ने लिखी है। पुस्तक में सोर: संक्षिप्त परिचय, लोक जीवन, ग्राम्य भोजन, लोक आस्था, पर्व तथा उत्सव, लोकगीत तथा नृत्य, लुप्त प्रायः परंपराएं, विवाह और बारात, प्रमुख मेले, प्रमुख लोक देवता कुल 10 शीर्षक हैं। इस पुस्तक में पंत जी ने पिथौरागढ़ के इतिहास, लोक जीवन, ग्राम्य जीवन, सामाजिक धार्मिक जीवन, लोक आस्था, देवी देवताओं, पर्वों, उत्सवों- चैतोल, आंठू, हिलजात्रा, दुनिया, ठुल खेल, छलिया नाच, लुप्त परंपराओं जैसे, भैलो तथा गीर, सिर पंचमी, गै त्यार, आरो, हुड़क्या बौल, भड़ा, विवाह संस्कार आदि के विषय में अच्छी जानकारी प्रदान की है। 

      कृषि लोकनाट्य हिलजात्रा के विषय में लेखक ने लिखा है- ‘गमरा’ विसर्जन के दिन ‘गमरा-महेसर’ के विग्रहों का विसर्जन करने से पहले सोर के कतिपय ग्रामों में ‘हिलजात्रा’ नामक मनोरंजक नृत्य-गीत युक्त एक प्रकार के नाटक का मंचन किया जाता है। गाँव के निकट का कोई छोटा-बड़ा मैदान इसका रंगमंच होता है। ग्राम के युवक पात्र के अनुसार, सजे सजाये लकड़ी से बने मुखौटे पहनकर अनेक चरित्रों का अभिनय करते हैं। ( पृ० 107) 


पुस्तक का नाम- सोर की लोक थात
विधा- आलेख
रचनाकार- पद्मादत्त पंत
प्रकाशक- नवोदय पर्वतीय कला केंद्र, पिथौरागढ़
पुस्तक का मूल्य- 100 ₹ ( पेपरबैक संस्करण) 
पृष्ठ संख्या- 180


लेखक के विषय में-

पद्मादत्त पंत

    लेखक पद्मादत्त पंत का जन्म पिथौरागढ़ जनपद के सौन सोर पट्टी के पंत्यूड़ी गाँव में 12 जून,1935 को हुआ। आपने बीएससी व बी.टी. करने के बाद शिक्षण कार्य किया। आपने उत्तर प्रदेश के इंटर कॉलेजों में अध्यापन किया और प्रधानाचार्य के पद से सेवानिवृत्त हुए। वर्तमान में आप पिथौरागढ़ में रहकर ही स्वतंत्र लेखन कर रहे हैं। 

    मेरी यादों का सोर-पिठौरागढ़, सोर की लोक थात (2010), रोगोपचारक लोक मंत्र संग्रह (2014), कैलाश मानसरोवर (2016), जागर: एक लोकगाथा ( 2018) आपकी प्रकाशित पुस्तकें हैं। आपकी पुस्तकों में सोरघाटी का लोक-समाज अपने प्रकृत रूप में अभिव्यक्त हुआ है। 

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