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भारतीय संस्कृति में शंख, शंखों के प्रकार और उनका धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व

       माननीय प्रधानमंत्री मोदी जी द्वारा 22 मार्च की शाम 5 बजे ताली, थाल और शंख बजाने का आह्वान करने से एक बार पुनः ध्वनि विज्ञान प्रासंगिक हो उठा है। वस्तुतः शंख की ध्वनि को विज्ञान में हानिकारक कीटाणुओं व विषाणुओं का नाशक माना गया है। भारतीय वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस का मानना था कि शंख की ध्वनि जहाँ तक जाती है, वहाँ तक वातावरण में व्याप्त हानिकारक कीटाणुओं का नाश हो जाता है और वातावरण में शुद्धता फैलती है। आइये जानते हैं भारतीय संस्कृति में शंख व शंखनाद के महत्व के विषय में विस्तार से-

भारतीय संस्कृति में शंख, शंखों के प्रकार और उनका धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व

    भारतीय संस्कृति में शंखों का अत्यधिक महत्व है। भारत में पूजा-पाठ में शंख बजाने का चलन युगों-युगों से चला आ रहा है। देश के कई भागों में लोग शंख को पूजाघर में रखते हैं और इसे नियम‍ित रूप से बजाते हैं। वस्तुतः शंख समुद्र में पाए जाने वाले एक प्रकार के घोंघे का खोल है, जिसे वह अपनी सुरक्षा के लिए बनाता है। 

         शंख को समुद्रज, कंबु, सुनाद, पावनध्वनि, कंबु, कंबोज, अब्ज, त्रिरेख, जलज, अर्णोभव, महानाद, मुखर, दीर्घनाद, बहुनाद, हरिप्रिय, सुरचर, जलोद्भव, विष्णुप्रिय, धवल, स्त्रीविभूषण, पाञ्चजन्य, अर्णवभव आदि नामों से भी जाना जाता है।

        शंखों का हिन्दू धर्म में पवित्र स्थान है।समुद्र मंथन के समय देव- दानव संघर्ष के दौरान समुद्र से 14 अनमोल रत्नों की प्राप्ति हुई, जिनमें आठवें रत्न के रूप में शंखों का जन्म हुआ। हिंदू धार्मिक ग्रंथों में घर या मंदिर में शंख कितने और कौन-से रखें जाएं इसके बारे में स्पष्ट उल्लेख मिलता है।

शंख शब्द

     मनुष्य के हाथों की अंगुलियों के प्रथम पोर पर भी शंखाकृति बनी होती है और अंगुलियों के नीचे भी। शंख के नाम से कई बातें विख्यात है जैसे योग में शंख प्रक्षालन और शंख मुद्रा होती है, तो आयुर्वेद में शंख पुष्पी और शंख भस्म का प्रयोग किया जाता है। प्राचीनकाल में शंख नाम से एक लिपि भी हुआ करती थी।

श्रेष्ठ शंख के लक्षण

शंखस्तुविमल: श्रेष्ठश्चन्द्रकांतिसमप्रभ:, 
अशुद्धोगुणदोषैवशुद्धस्तु सुगुणप्रद:। 

      अर्थात् निर्मल व चन्द्रमा की कांति के समान वाला शंख श्रेष्ठ होता है जबकि अशुद्ध अर्थात मग्न शंख गुणदायक नहीं होता। गुणों वाला शंख ही प्रयोग में लाना चाहिए। क्षीरसागर में शयन करने वाले सृष्टि के पालनकर्ता भगवान विष्णु के एक हाथ में शंख अत्यधिक पावन माना जाता है। इसका प्रयोग धार्मिक अनुष्ठानों में विशेष रूप से किया जाता है। 

 विश्व का सबसे बड़ा शंख

    विश्व का सबसे बड़ा शंख केरल राज्य के गुरुवयूर के श्रीकृष्ण मंदिर में सुशोभित है, जिसकी लंबाई लगभग आधा मीटर है तथा वजन दो किलोग्राम है। 

शंख के प्रमुख प्रकार

द्विधासदक्षिणावर्तिर्वामावत्तिर्स्तुभेदत:। 
दक्षिणावर्तशंकरवस्तु पुण्ययोगादवाप्यते। 
यद्गृहे तिष्ठति सोवै लक्ष्म्याभाजनं भवेत्। 

      शंख के 3 प्रमुख प्रकार हैं– वामावर्ती शंख, गणेश शंख या मध्यवर्ती शंख, दक्षिणावर्ती शंख। इन तीनों ही प्रकार के शंखों में कई शंख चमत्कारिक हैं, तो कई दुर्लभ और बहुत से सुलभ हैं। सभी तरह के शंखों के अलग-अलग नाम हैं। 

1. वामवर्ती शंख : वामवर्ती शंख का पेट बाईं ओर खुला होता है। इसके बजाने के लिए एक छिद्र होता है। इसकी ध्वनि से रोगोत्पादक कीटाणु कमजोर पड़ जाते हैं। यह शंख आसानी से मिल जाता है, क्योंकि यह बहुतायत में पैदा होता है। यह शंख घर से नकारात्मक ऊर्जा को बाहर निकालने में सक्षम है। उदाहरण- लक्ष्मी शंख, गोमुख शंख। 

2. मध्यवर्ती शंख या गणेश शंख : समुद्र मंथन के दौरान 8वें रत्न के रूप में सर्वप्रथम गणेश शंख की ही उत्पत्ति हुई थी। इसे गणेश शंख इसलिए कहते हैं, क्योंकि इसकी आकृति हू-ब-हू गणेशजी जैसी है। शंख में निहित सूंड का रंग अद्भुत प्राकृतिक सौन्दर्ययुक्त है। प्रकृति के रहस्य की अनोखी झलक गणेश शंख के दर्शन से मिलती है। यह शंख दरिद्रतानाशक और धन प्राप्ति का कारक है। इसकी पूजा से सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं। गणेश शंख आसानी से नहीं मिलने के कारण दुर्लभ होता है। 

3. दक्षिणावर्ती शंख : इस शंख को दक्षिणावर्ती इसलिए कहा जाता है, क्योंकि जहां सभी शंखों का पेट बाईं ओर खुलता है, वहीं इसका पेट विपरीत अर्थात् दाईं ओर खुलता है। इस शंख को देवस्वरूप माना गया है। 

         दक्षिणावर्ती शंख 2 प्रकार के होते हैं नर और मादा। जिसकी परत मोटी और भारी हो वह नर और जिसकी परत पतली और हल्का हो, वह मादा शंख होता है। 

       दक्षिणावर्ती शंख के पूजन से खुशहाली आती है और लक्ष्मी प्राप्ति के साथ-साथ संपत्ति भी बढ़ती है। इस शंख की उपस्थिति ही कई रोगों का नाश कर देती है। दक्षिणावर्ती शंख में रात में जल भरकर रख दिया जाए और सुबह उठकर खाली पेट उस जल को पिया जाए तो पेट के रोग जल्दी समाप्त हो जाते हैं। नेत्र रोगों में भी यह लाभदायक है। उदाहरण- मोती शंख। 

कुछ विशिष्ट शंख

1. कृष्ण का पाञ्चजन्य शंख- महाभारत काल में लगभग सभी योद्धाओं के पास शंख होते थे। उनमें से कुछ योद्धाओं के पास तो चमत्कारिक शंख होते थे, जैसे भगवान कृष्ण के पास पाञ्चजन्य शंख था जिसकी ध्वनि कई किलोमीटर तक पहुंच जाती थी।

पाञ्चजन्यं हृषीकेशो देवदत्तं धनञ्जय:।
पौण्ड्रं दध्मौ महाशंखं भीमकर्मा वृकोदर:।।
                                     -महाभारत

     भगवान श्रीकृष्ण के पास पाञ्चजन्य शंख था। कहते हैं कि यह शंख आज भी कहीं मौजूद है। इस शंख के हरियाणा के करनाल में होने के बारे में कहा जाता रहा है। माना जाता है कि यह करनाल से 15 किलोमीटर दूर पश्चिम में काछवा व बहलोलपुर गांव के समीप स्थित पराशर ऋषि के आश्रम में रखा था, जहां से यह चोरी हो गया। यहां हिन्दू धर्म से जुड़ी कई बेशकीमती वस्तुएं थीं। 

    मान्यता है कि भगवान श्रीकृष्ण ने महाभारत युद्ध के बाद अपना पाञ्चजन्य शंख पराशर ऋषि के तीर्थ में रखा था। हालांकि कुछ लोगों का मानना है कि श्रीकृष्ण का यह शंख आदि बद्री में सुरक्षित रखा है। महाभारत युद्ध में श्रीकृष्ण अपने पाञ्चजन्य शंख से पांडव सेना में उत्साह का संचार ही नहीं करते थे बल्कि इससे कौरवों की सेना में भय व्याप्त हो जाता था। इसकी ध्वनि सिंह गर्जना से भी कहीं ज्यादा भयानक थी। इस शंख को विजय व यश का प्रतीक माना जाता है। इसमें 5 अंगुलियों की आकृति होती है।

2. वीणा शंख- विद्या की देवी सरस्वती भी शंख धारण करती है। यह शंख वीणा समान आकृति का होता है इसीलिए इसे वीणा शंख कहा जाता है। माना जाता है कि इसके जल को पीने से मंदबुद्धि व्‍यक्ति भी ज्ञानी हो जाता है। अगर वाणी में कोई दोष है या बोल नहीं पाते हैं तो, इस शंख का जल पीने के साथ-साथ इसे बजाना भी लाभकारी होता है। 

3. देवदत्त शंख- यह शंख महाभारत में अर्जुन के पास था। वरुणदेव ने उन्हें यह उपहार में दिया था। इसका उपयोग दुर्भाग्यनाशक माना गया है। माना जाता है कि इस शंख का उपयोग न्याय क्षेत्र में विजय दिलवाता है। इस शंख को शक्ति का प्रतीक माना जाता है।

4. महालक्ष्मी शंख- इस शंख को प्राकृतिक रूप से निर्मित श्रीयंत्र भी कहा जाता है इसीलिए इसका नाम महालक्ष्मी शंख है। इसकी आवाज सुरीली होती है। 

5. पौण्ड्र शंख- पोंड्रिक या पौण्ड्र शंख महाभारत में ‍भीष्म के पास था। जिस व्यक्ति में आत्मविश्वास की कमी हो उन्हें यह शंख रखना चाहिए। इसका उपयोग विद्यार्थियों के लिए उत्तम माना गया है। 

6. गोमुखी कामधेनु शंख- यह शंख कामधेनु गाय के मुख जैसी रूपाकृति का होने से इसे गोमुखी कामधेनु शंख के नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि कामधेनु शंख की पूजा-अर्चना करने से तर्कशक्ति प्रबल होती है। महर्षि पुलस्त्य ने लक्ष्मी प्राप्ति के लिए इस शंख का उपयोग किया था। 

7. हीरा शंख- इसे पहाड़ी शंख भी कहा जाता है। इसका इस्तेमाल तांत्रिक लोग विशेष रूप से देवी लक्ष्मी की पूजा के लिए करते हैं। यह दक्षिणावर्ती शंख की तरह खुलता है। यह पहाड़ों में पाया जाता है। इसकी खोल पर ऐसा पदार्थ लगा होता है, जो स्पार्कलिंग क्रिस्टल के समान होता है इसीलिए इसे हीरा शंख भी कहते हैं। यह बहुत ही बहूमुल्य माना गया है।

8. कौरी शंख- कौरी शंख अत्यंत ही दुर्लभ शंख है। माना जाता है कि यह जिसके भी घर में होता है उसका भाग्य खुल जाता है और समृद्धि बढ़ती जाती है। प्राचीनकाल से ही इस शंख का उपयोग गहने, मुद्रा और पांसे बनाने में किया जाता रहा है। कौरी को कई जगह कौड़ी भी कहा जाता है।

9. ऐरावत शंख- इंद्र के हाथी ऐरावत के समान दिखने के कारण इसे ऐरावत शंख कहते हैं। यह शंख मूलत: सिद्धि और साधना प्राप्ति के लिए होता है। माना जाता है कि रंग और रूप को निखारने के लिए भी इस शंख के जल का उपयोग किया जाता है। 

10. मोती शंख- यह सुख और शांति का प्रतीक है। मोती शंख हृदय रोगनाशक भी माना गया है।

11. अनंतविजय शंख- युधिष्ठिर के शंख का नाम अनंतविजय था। अनंत विजय अर्थात अंतहीन जीत। यह शंख विजय का प्रतीक है। 

12. मणि पुष्पक और सुघोषमणि शंख- नकुल के पास सुघोष और सहदेव के पास मणि पुष्पक शंख था। मणि पुष्पक शंख की पूजा-अर्चना से यश कीर्ति, मान-सम्मान प्राप्त होता है। 

13. विष्णु शंख- इस शंख का उपयोग लगातार प्रगति के लिए और असाध्य रोगों में शिथिलता के लिए किया जाता है। प्रतिदिन इस शंख के जल का सेवन करने से कई तरह के असाध्य रोग भी मिट जाते हैं।

14. गरूड़ शंख- गरूड़ की मुखाकृति समान होने के कारण इसे गरूड़ शंख कहा गया है। यह शंख भी अत्यंत दुर्लभ है। यह शंख भी सुख, समृद्धिवर्द्धक और विपत्तिनाशक है।

15. रुद्र और त्रिपुर शंख- भगवान शिव रुद्र शंख को बजाते थे, लेकिन त्रिपुरासुर के संहार के समय उन्होंने त्रिपुर शंख बजाया था।

16. अन्नपूर्णा शंख- अन्नपूर्णा का अर्थ होता है अन्न की पूर्ति करने वाला या वाली। इस शंख धन और समृद्धि बढ़ाता है। 

      उपर्युक्त के अलावा चक्र शंख, राक्षस शंख, शनि शंख, राहु शंख, पंचमुखी शंख, वालमपुरी शंख, बुद्ध शंख, केतु शंख, शेषनाग शंख, कच्छप शंख, शेर शंख, सुदर्शन शंख आदि शंख भी होते हैं। 

शंखों का धार्मिक महत्व

1. शंख: लक्ष्मी का भाई- हिंदू धर्म में शंख का बड़ा महत्व है। धार्मिक ग्रंथों में शंख को लक्ष्मी का भाई बताया गया है, क्योंकि लक्ष्मी की तरह शंख भी सागर से ही उत्पन्न हुआ है। शंख की गिनती समुद्र मंथन से निकले चौदह रत्नों में होती है। कहते हैं जिस घर में शंख होता है और उसकी पूजा होती हैं, वहां माता लक्ष्मी जी जरूर निवास करती है। 

2. शंख: पवित्रता का प्रतीक- मांगलिक कार्यों, धार्मिक उत्सवों, यज्ञ एवं कथाओं में शंख को बजाना बड़ा ही शुभ माना जाता है। शंख को इसलिए भी शुभ माना गया है, क्योंकि माता लक्ष्मी और भगवान विष्णु, दोनों ही अपने हाथों में इसे धारण करते हैं। पूजा-पाठ में शंख बजाने का चलन युगों-युगों से है। देश के कई भागों में लोग शंख को पूजाघर में रखते हैं और इसे नियम‍ित रूप से बजाते हैं। 

3. नादब्रह्म- शंख को नादब्रह्म और दिव्य मंत्र की संज्ञा दी गई है। शंख की ध्वनि को ‘ॐ’ की ध्वनि के समकक्ष माना गया है। शंख नाद का प्रतीक है। शंख ध्वनि शुभ मानी गई है। प्रत्येक शंख का गुण अलग-अलग माना गया है। कोई शंख विजय दिलाता है, तो कोई धन और समृद्धि। शंखनाद से हमारे आसपास की नकारात्मक ऊर्जा का नाश तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। शंख से निकलने वाली ध्वनि जहां तक जाती है, वहां तक बीमारियों के कीटाणुओं का नाश हो जाता है।

4. शंख: देवत्व का प्रतीक- ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार शंख चंद्रमा और सूर्य के समान ही देवस्वरूप है। इसके मध्य में वरुण, पृष्ठ भाग में ब्रह्मा और अग्र भाग में गंगा और सरस्वती का निवास है।

5. शंख से वास्तुदोष का निदान- शंख से वास्तुदोष भी मिटाया जा सकता है। शंख को किसी भी दिन लाकर पूजा स्थान पर पवित्र करके रख लें और प्रतिदिन शुभ मुहूर्त में इसकी धूप-दीप से पूजा की जाए तो घर में वास्तुदोष का प्रभाव कम हो जाता है। 

6. राक्षसों व शत्रुओं का विनाशक- अथर्ववेद के अनुसार, शंख से राक्षसों का नाश होता है- “शंखेन हत्वा रक्षांसि।” भागवत पुराण में भी शंख का उल्लेख हुआ है। यजुर्वेद के अनुसार युद्ध में शत्रुओं का हृदय दहलाने के लिए शंख फूंकने वाला व्यक्ति अपेक्षित है। अद्भुत शौर्य और शक्ति का संबल शंखनाद से होने के कारण ही योद्धाओं द्वारा इसका प्रयोग किया जाता था।

7. वातावरण की शुद्धता- पूजा-पाठ में शंख बजाने से वातावरण पवित्र होता है। जहां तक इसकी आवाज जाती है, इसे सुनकर लोगों के मन में सकारात्मक विचार पैदा होते हैं।

8. शंख के जल की महत्ता- शंख के जल से श‍िव, लक्ष्मी आदि का अभि‍षेक करने से ईश्वर प्रसन्न होते हैं और उनकी कृपा प्राप्त होती है। ब्रह्मवैवर्त पुराण में कहा गया है कि शंख में जल रखने और इसे छ‍िड़कने से वातावरण शुद्ध होता है। 

9. कामनापूर्ति- ऐसी मान्यता है कि शंख की पूजा से कामनाएं पूरी होती हैं। 

10. शांतिप्रदायक- कहा जाता है की घर में शंख का बजना बुरी भावना को दूर करता है और घर में शांति लाता है। 

शंखों का वैज्ञानिक महत्व

1. सकारात्मक ऊर्जा- शंखनाद से हमारे आसपास की नकारात्मक ऊर्जा का नाश तथा सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। सकारात्मक ऊर्जा के कारण आत्मबल में वृद्धि होती है। 

2. कीटाणुओं व विषाणुओं का नाश- विज्ञान के अनुसार शंख की ध्वनि महत्वपूर्ण होती है। वैज्ञानिकों के अनुसार शंख-ध्वनि से वातावरण का परिष्कार होता है, इसकी ध्वनि जहां तक जाती हैं वहां तक सभी हानिकारक कीटाणुओं व विषाणुओं का नाश हो जाता है। 

3. फेफड़ों के लिए फायदेमंद- शंख बजाते वक्त हमें काफी ताकत की जरूरत पढ़ती है। जिसकी वजह से फेफड़ों की अच्‍छी एक्‍सरसाइज हो जाती है। अगर आप हर दिन शंख फूंकते हैं तो ये काफी अच्छा माना जाता है। इससे आपको गले और फेफड़ों के कोई रोग नही होंगे। 

4. स्मरणशक्ति-वर्धक- शंख फूंकने से यादाश्त काफी अच्छी रहती है।

5. त्‍वचा की देखभाल- शंख आपके चेहरे को खूबसूरत बनाने में काफी मदतगार होता है। यदि आप रात को शंख में पानी भरकर रख दें, फिर सुबह उस पानी से अपने चेहरे की मसाज करें। ऐसा करने से एलर्जी, रैशेज, सफेद दाग जैसी बीमारियों से छुटकारा मिलेगा।  

6. आंखों के लिए गुणकारी- शंख के पानी को अपनी हथेली पर लेकर उसमें अपनी आंखों को डुबा कर पुतलियों को हिलाए। ऐसा करने से ड्राई आई सिंड्रोम, सूजन, आंखों में इंफेक्‍शन जैसी परेशानियों से भी छुटकारा मिलता है। साथ ही शंख में रखे हुए पानी में बराबर मात्रा में नॉर्मल पानी मिलाकर अपनी आंखें धोयें। इससे आपके आंखों की रोशनी तेज होगी। 

7. बालों के लिए लाभदायक- रात को शंख में रखे पानी से बाल धोने से बालों में निखार आता है। 

8. हृदयघात की संभावना कम- शंख फूंकने से फेफड़ों के माध्यम से दूषित हवा बाहर निकल जाती है जिसकी वजह से शरीर को एनर्जी मिलती है। इसके अलावा शंख की आवाज सुनना भी हृदयरोगियों के लिए लाभदायक होता है। शंख की आवाज से हृदयाघात होने की संभावनाएं काफी कम रहती हैं।

9. कैल्शियम की पूर्ति- शंख में थोडा सा चूने का पानी भरकर पीने से कैल्शियम की कमी की पूर्ति हो जाती है ।

10. वाणी दोष का निवारण- शंख को नियमित बजाने से वाणी दोष का निवारण होता है ।

11. पेट की बिमारियों में उपयोगी- आयुर्वेद के मुताबिक, शंखोदक के भस्म के उपयोग से पेट की बीमारियां, पथरी, पीलिया आदि कई तरह की बीमारियां दूर होती हैं, किंतु इसका उपयोग एक्सपर्ट वैद्य की सलाह से ही किया जाना चाहिए। 

12. श्वांस की बिमारियों में लाभदायक- पुराणों के जिक्र मिलता है कि अगर श्वास का रोगी नियमि‍त तौर पर शंख बजाए तो वह गले व श्वशन संबंधी बिमारियों से मुक्त हो सकता है। 

13. हड्डियों के लिए लाभदायक- शंख में रखे पानी का सेवन करने से शरीर की हड्डियां मजबूत होती हैं। 

14. दांतों के लिए लाभदायक- शंख दांतों के लिए भी लाभदायक है। शंख में कैल्श‍ियम, फास्फोरस व गंधक के गुण होने के कारण यह फायदेमंद है। 

      अत: नियमित रूप से शंख बजाना अनेक रोगों से मुक्ति दिलाता है। शंख बजाने से चेहरे, श्वसन तंत्र, श्रवण तंत्र तथा फेफड़ों का व्यायाम होता है। शंखवादन से स्मरण शक्ति बढ़ती है। शंख से मुख के तमाम रोगों का नाश होता है। पेट में दर्द रहता हो, आंतों में सूजन हो अल्सर या घाव हो तो दक्षिणावर्ती शंख में रात में जल भरकर रख दिया जाए और सुबह उठकर खाली पेट उस जल को पिया जाए तो पेट के रोग जल्दी समाप्त हो जाते हैं। नेत्र रोगों में भी यह लाभदायक है। इस प्रकार शंख की महिमा धर्म ही नहीं वरन् विज्ञान भी मानता है।

 शंख और कोरोना वायरस

     चूंकि कोरोना एक वायरस है। यदि विज्ञान की मानें तो शंखध्वनि आसपास के विषाणुओं व हानिकारक कीटाणुओं का नाश करती है। अतः शंखनाद / शंखध्वनि कोरोना वायरस से मुक्ति भले ही न दिलाए परंतु यह कहीं-न-कहीं वायरस के लिए अवरोधी/प्रतिरोधी का काम जरूर करेगी। 

     इसलिए साथियों, यदि आपके घर में शंख है तो प्रतिदिन सुबह-शाम पूजा-पाठ के साथ शंख बजाइये, स्वस्थ रहिये। 

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