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गाँव, मंदिर, कंकाल और वह जंगल के बीच का झरना

यात्रावृतांत-

गाँव, मंदिर, कंकाल और वह जंगल के बीच का झरना

         कल मुझे अपने शिक्षक साथी गणेश चंद्र शर्मा के साथ अल्मोड़ा के समीपवर्ती ग्राम बल्टा के भ्रमण का सौभाग्य प्राप्त हुआ। बल्टा गाँव के भ्रमण का उद्देश्य यह था कि यह अल्मोड़ा का समीपवर्ती सब्जी उत्पादक गाँव है। यहाँ के किसान व महिलाएँ सब्जी विक्रय हेतु अल्मोड़ा पैदल ही चले आते हैं। इसीलिए इस गाँव के भ्रमण की इच्छा हमारे मन में बार-बार समुद्री लहरों की तरह हिलोरें ले रहीं थीं। 

    खैर, अल्मोड़ा के शिखर तिराहे से दोपहर 12 बजे के बाद हम लोगों ने बाइक से भ्रमण हेतु प्रस्थान किया। दो किलोमीटर के बाद हम लोग पपरशैली पहुंचे। पपरशैली से थोड़ा आगे ( कसारदेवी से पूर्व ) पहुंचने के बाद हम लोग दाहिनी ओर मुड़ गए। यहां हमने दस-बारह मकानों के समूह देखे। वन पंचायत की भूमि में बने मकानों को देखकर हम अटकलें लगाने लगे। यहाँ से हमारी बाइक घुमावदार सड़क पर रेंकती हुई लगभग बीस मिनट बाद घाटी में स्थित एक गाँव में पहुंची और यह गाँव था बल्टा। अल्मोड़ा से बल्टा गाँव की दूरी लगभग आठ किलोमीटर है। 

       सड़क के अंतिम छोर या यूँ कहें कि गाँव के प्रारंभ में पहुंचते ही हमें भूमिया देवता का मंदिर दिखाई दिया। गाँव के प्रारंभ में ही मंदिर का दर्शन होना यह स्वयं में एक सुखद अनुभूति है। यह देवभूमि की विशेषता है कि यहाँ के हर गाँव के प्रारंभ में या मध्य में मंदिर जरूर दिखाई देगा। वैसा ही कुछ हमें इस गाँव में भी देखने को मिला। मंदिर के समीप ही कुछ लोग बैठकर बातें कर रहे थे। उन्हीं में से एक छोटी मूछों वाले दुबले-पतले व्यक्ति आकर हमारे साथ बातचीत करने लगे। 

      बातें कौन, कहाँ से शुरू होकर शिक्षा, समाज, संस्कृति तक पहुंच गई। उन्होंने बताया कि बल्टा गाँव ही नहीं बल्कि सामने के गावों से भी सब्जियाँ बेचने लोग अल्मोड़ा जाते हैं। विशेषकर राई, पालक, मेथी, फूलगोभी, बंदगोभी, धनिया आदि का उत्पादन यहाँ पर्याप्त मात्रा में होता है। पूछने पर सामने के गाँवों के नाम उन्होंने बिंतोला और भिरूड़ा बताए। उन्होंने बताया कि सीजन में पर्याप्त मात्रा में सब्जियाँ यहाँ से अल्मोड़ा भेजी जाती हैं। 

    उन्होंने हमारे साथ अपने युवावस्था की यादें भी साझा कीं और कहा कि एक समय था जब अल्मोड़ा व समवर्ती गांवों के मध्य यहाँ क्रिकेट टूर्नामेंट आयोजित होता था। किक्रेट का इतना अधिक क्रेज था कि लोग इस खेल से भावनात्मक रूप से जुड़े होते थे। खिलाड़ी अपनी टीम की जीत के लिए घंटों मंदिर में पूजा-प्रार्थना करते थे और हारने पर चुपचाप घर के भीतर दुबकर दुख मनाया करते थे। 

    ये छोटी मूंछ वाले सज्जन कोई और नहीं बल्कि बल्टा गाँव के पूर्व प्रधान अर्जुन मेहता थे। मेहता जी ने गाँव की अनेक बातें हमारे साथ साझा कीं। बल्टा गाँव के मध्य हमें एक गाड़ (छोटी नदी) भी दिखाई दी। संभवतया यह गाड़ ही आगे जाकर सुयाल नदी का रूप धारण करती होगी। बातचीत के दौरान हमने पहाड़ी के शिखर पर बने दस-बारह मकानों का भी जिक्र किया। मेहता जी ने बताया कि मकान आपदा प्रभावित ग्रामीणों के हैं। कुछ वर्षों पूर्व समीपवर्ती गाँव में भूस्खलन होने के कारण उन्हें वहाँ विस्थापित कर दिया गया था। 

     इसी बीच शर्मा जी ने एक झरने का जिक्र मेहता जी से किया। मेहता जी ने बताया कि हां यहाँ एक झरना भी है, जो गाड़ के ऊपरी हिस्से से निकलता है। उन्होंने बताया कि यह झरना पिछले ही वर्ष कुछ युवाओं द्वारा सोशल मीडिया में तस्वीरें डालने के कारण चर्चा में आया। अब हमारा मन झरना देखने का बन चुका था, इसीलिए हम लोग मेहता जी के भोजन के आग्रह को स्वीकार न कर पैदल झरना देखने चल दिए। 

         गाँव की ऊपरी पहाड़ी से होते हुए हम आगे बढ़े। एक किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद एक छोर पर हमें एक युवक बैठा दिखाई दिया। मुझे लगा कि शायद वह कुछ पढ़ रहा है। मैंने उससे उसका नाम पूछा, तो उसने गौरव बताया और कहा कि वह इंटर का छात्र है। फिर मैंने पूछा कि क्या आप पढ़ रहे थे ? उसने बताया कि वह ग्वाले (गाय-बकरियां चराने) आया है और अभी मोबाइल में फिल्म देखकर टाइमपास कर रहा है।

    इसके पश्चात शर्मा जी ने उससे झरने का पता पूछा, तो उसने अंगुली के इशारा करते हुए कहा कि सामने की पहाड़ियों के बीच ही झरना बहता है, लेकिन वहाँ का रास्ता बहुत ही उबड़-खाबड़ है। उसने कहा कि झरने से पहले एक बड़ा चपटा पत्थर आयेगा और उस पत्थर से कुछ ही दूरी पर झरना स्थित है। शर्मा जी ने लड़के से कहा कि वह भी साथ में चले, तो उसने साफ मना कर दिया। उसने कहा कि अगर वह हमारे साथ गया तो कहीं बाघ उसकी बकरियों का निवाला न बना दे। 

      हमें गौरव के साथ बात करके अच्छा लगा। उसके बाद हम लोग उबड़-खाबड़ पथरीले रास्ते पर ढलान की ओर चल पड़े। लगभग दो किलोमीटर की दूरी तय करने के बाद हम गाड़ के समीप पहुंचे। गाड़ में पानी काफी कम था। फिर हम हौले-हौले गाड़ में ही आगे की ओर बढ़ने लगे। गाड़ किनारे हमें कुछ गुफाएं दिखीं। एक गुफा के सामने एक पशु का कंकाल पड़ा हुआ था। हमने समीप से देखा तो वह एक गाय का कंकाल प्रतीत हो रहा था। संभवतया यह कंकाल दो हफ्ते से अधिक पुराना नहीं था। 

      कंकाल देखते ही हमें बाघ का ध्यान आया। जरूर इन गुफाओं के भीतर बाघ रहता होगा। खैर, हम आगे बढ़ते रहे। कुछ ही पलों बाद हमें एक विशाल पत्थर दिखाई दिया। यह वही पत्थर था, जिसका जिक्र गौरव ने किया था। मैं अनुमान लगा रहा था कि शायद अब हम झरने के निकट हैं। हम और अधिक उत्साह से आगे बढ़ते रहे। 

       झरने तक पहुंचने का कोई रास्ता नहीं था। हम नदी के ऊंचे-नीचे, चपटे और बड़े-बड़े पत्थरों के ऊपर से आगे बढ़ रहे थे। थोड़ी दूर चलने पर हमें छल-छल-छल-छल की ध्वनि सुनाई। शर्मा जी उछल पड़े- “देखिए सर, सामने है झरना।” छल-छल की ध्वनि तो मुझे भी सुनाई दे रही थी, लेकिन झरना कहीं दिखाई नहीं दे रहा था। शर्मा जी ने अंगुली के इशारे से कहा- “वो देखिए।” मैंने अंगुली की दिशा में नजर घुमाई- “हाँ, झरना तो है, लेकिन इस तक पहुंचने का तो कोई रास्ता ही नहीं सूझ रहा।”

       दूर झाड़ियों के बीच पानी की धाराएँ गिरती हुई दिख रही थीं, किंतु रास्ता एकदम बंद था। चारों ओर सिसूण (बिच्छू घास), झिटालू, हिंसालू, किरमड़ आदि की झाड़ियाँ और चीड़ के पेड़ नजर आ रहे थे। पहले शर्मा जी ने कोशिश की, किंतु वे सफल नहीं हो पाये। फिर मैंने कोशिश की किंतु मुझे भी निराशा ही हाथ लगी, क्योंकि गिरते पानी की धाराओं तक पहुंचने का एक ही रास्ता था, वह था नदी का रास्ता, लेकिन नदी अब बहुत छोटी, संकरी और दलदली हो गई थी। हमने आगे बढ़ने की कोशिश तो की किंतु दलदल में पैर धंसने के कारण हम आगे नहीं बढ़ पाए।

     शर्मा जी का मानना था कि यही झरना है और हम इस झरने तक नहीं पहुंच पायेंगे। अगर यही झरना है तो निश्चित रूप से शर्मा जी कहना एकदम सही था, इस झरने तक पहुंचना एकदम नामुमकिन प्रतीत हो रहा था। हमारे मन में निराशा उत्पन्न हो रही थी और हम वापस लौटने के लिए तैयार हो गए थे। लेकिन अचानक ही मेरे दिमाग ने अपनी बेहतरीन उपस्थिति दर्ज की। 

      दरअसल में जिस जगह पर हम खड़े थे, वहाँ से नदी दो हिस्सों में बंटी थी। एक हिस्से में ऊपर वाला झरना था और दूसरे में एक गधेरा-सा था, जिसमें पानी न के बराबर था। शर्मा जी का कहना था कि इस सूखे गधेरे की ओर झरना नहीं हो सकता, क्योंकि झरना होता तो गधेरे में जरूर पानी भी होता। शर्मा जी का कहना एकदम तर्कसंगत था। 

        उसी समय अचानक मेरे दिमाग में विचार आया कि क्यों न एक बार गधेरे में कुछ दूर जाकर देख लिया जाय, क्योंकि जो झरना हमने देखा था, वह मुझे झरना कम बल्कि पानी की धाराओं का अल्प प्रवाह मात्र प्रतीत हो रहा था। विचार आते ही मैंने गधेरे में चढ़ना शुरू किया। शर्मा जी को अब भी यकीन नहीं हो रहा था कि इस सूखे गधेरे में झरना हो सकता है, इसीलिए वे मुझसे वापस चलने का आग्रह कर रहे थे, लेकिन मैं आगे बढ़ता गया। सहसा मुझे स्वां-स्वां की ध्वनि आती सुनाई दी। मुझे लगा कि मैं सही मार्ग पर हूँ। मैंने उत्साह में घोषणा कर दी- “शर्मा जी, झरना मिल गया।”

          शर्मा जी ने सुना तो वे भी उत्साहित होकर आगे बढ़े। अब हम फिर साथ- साथ गधेरे में ऊपर की ओर चढ़ने लगे। सहसा मुझे स्वां-स्वां की ध्वनि छल-छल में बदलती प्रतीत हुई। अब मुझे पूर्ण विश्वास हो गया था कि असली झरना समीप ही है। दस कदम आगे बढ़ने पर हमने खुद को एक खूबसूरत झरने के समीप पाया। यद्यपि झरने में पानी कम था, किंतु हमने कल्पना की कि बरसात के दिनों यह झरना जरूर अपनी भरपूर जवानी जीता होगा। हमने झरने के समीप तस्वीरें खींचीं और सुखद अनुभूति के साथ लौट आए। वापसी में हमने नदी किनारे बने पुराने ध्वस्त हुए घट्ट (पनचक्की) भी देखे। 

         लगभग एक घंटे बाद हम भूमिया देवता के मंदिर पर थे, जिसके समीप ही हमने बाइक रोकी थी। दूर पहाड़ियों के रस्ते सूर्य देवता अपने घर वापस लौटने लगे थे। शर्मा जी ने बाइक स्टार्ट की और अब हम भी हौले-हौले वापस अपने आवास की ओर प्रस्थान कर चुके थे। इस यात्रा से मुझे एहसास हुआ कि रोमांच केवल बड़ी-बड़ी यात्राओं में नहीं होता, बल्कि छोटी-छोटी यात्राएँ भी अप्रतिम रोमांच की जन्मदात्री होती हैं। 

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