साथियों, देश में कोरोना वायरस की तीसरी लहर का खतरा बना हुआ है। इसलिए हम सभी को सजग रहने की जरूरत है। वैक्सीन जरूर लगायें और कोविड नियमों का पालन करें। तभी हम स्वयं की व दूसरों की सुरक्षा कर पाने में सक्षम हो पायेेंगे।

क्या उत्तराखंड की लोकभाषाएं 8वीं अनुसूची में शामिल हो पायेंगी


पोर्टल के माध्यम से प्रधानमंत्री जी को लिखा गया पत्र

सेवा में, 
        प्रधानमंत्री, 
        भारत सरकार, नई दिल्ली। 

विषय- कुमाउनी और गढ़वाली लोक बोलियों को 8 वीं अनुसूची में शामिल करने के संबंध में। 

महोदय, 
        मैं इस पत्र के माध्यम से आपका ध्यान उत्तराखंड की लोक बोलियों की ओर आकृष्ट करना चाहूंगा। उत्तराखंड की दो लोक बोलियाँ हैं- कुमाउनी और गढ़वाली। इन दोनों बोलियों को देश भर में लाखों लोग बोलते हैं। इतना ही नहीं विदेशों में भी कुमाउनी और गढ़वाली बोलने वाले लोग निवास करते हैं। कुमाउनी और गढ़वाली में साहित्य भी पर्याप्त मात्रा में लिखा जा चुका है। कुमाउनी को लोक रत्न गुमानी पंत, गौरीदत्त पांडे ‘गौर्दा’, शेर सिंह बिष्ट ‘अनपढ़’, गिरीश तिवारी ‘गिर्दा’, चारू चंद्र पांडे, मथुरा दत्त मठपाल, बहादुर बोरा ‘श्री बंधु’, बंशीधर पाठक आदि जैसे विशिष्ट लेखकों ने समृद्ध किया है, तो वहीं दूसरी ओर गढ़वाली को भी भजन सिंह, तोता कृष्ण गैरोला, कन्हैया लाल डंडरियाल, मोहन बाबुलकर, गोविन्द चातक आदि जैसे प्रतिष्ठित लेखकों ने अपना योगदान दिया है।
         वर्तमान में कुमाउनी में 500 से अधिक लेखक और गढ़वाली में 450 से अधिक लेखक लेखन कार्य में सक्रिय हैं। कुमाउनी में वर्तमान में पहरू ( मासिक, अल्मोड़ा ), आदलि-कुशलि ( मासिक, पिथौरागढ़), कुमगढ़ ( द्वैमासिक, हल्द्वानी ), कुर्मांचल अखबार ( साप्ताहिक, अल्मोड़ा), दुदबोलि ( वार्षिक, रामनगर ) और गढ़वाली में धाद ( मासिक) पत्र-पत्रिकाओं का प्रकाशन कार्य हो रहा है। इसके अलावा इन दोनों भाषाओं के सम्मेलन भी समय-समय पर आयोजित होते रहते हैं। कुमाउनी भाषा, साहित्य और संस्कृति प्रचार समिति, कसार देवी पिछले 10 वर्षों से अल्मोड़ा में कुमाउनी भाषा का एक राष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित करती आ रही है। 
       महोदय, उत्तराखंड राज्य की स्थापना के साथ ही उत्तराखंड की जनता की यह मांग रही है कि इन दोनों लोक बोलियों को संविधान की 8वीं अनुसूची में स्थान दिया जाय, लेकिन तमाम आश्वासनों के बावजूद अभी तक इस दिशा में कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाये गये हैं। अतः आपसे विनम्र निवेदन है कि आप जरूर इस दिशा में प्रयास कीजिएगा। हमें आशा ही नहीं पूर्ण विश्वास है कि आप उत्तराखंड राज्य की जनता की मांग और उनके संघर्ष को व्यर्थ नहीं जाने देंगे और जरूर कुमाउनी और गढ़वाली लोक बोलियों को संविधान की 8वीं अनुसूची में स्थान दिलायेंगे। 

 प्रार्थी, 
डा० पवनेश ठकुराठी,
दि०- 26 जुलाई, 2019
समस्त भाषा एवं साहित्य प्रेमी तथा उत्तराखंड की जनता। 

( नोट- यह पत्र 26-07-2019 को पोर्टल के माध्यम से प्रधानमंत्री जी को लिखा गया था। दि० 24 फरवरी, 2020 को जाइंट सेकेट्री श्री एस. सी. एल. दास द्वारा इस पर कार्यवाही की गई और इस विषय को नोट कर लिया गया है। आप भी अपने-अपने स्तर से इस हेतु प्रयास कीजिएगा। शुक्रिया। ) 

Share this post
2 Comments

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!