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कुमाउनी-हिंदी शब्दकोश: कुमाउनी का पहला शब्दकोश (Kumauni Hindi Shabdkosh: First dictionary of Kumauni Language)

कुमाउनी हिंदी शब्दकोश: कुमाउनी का पहला शब्दकोश

Kumauni Hindi Shabdkosh: First dictionary of Kumauni Language

         साथियों, क्या आपको पता है कि कुमाउनी का पहला शब्दकोश कौन-सा है और वह किसके द्वारा लिखा गया है ? चलिए आज हम कुमाउनी के पहले शब्दकोश और उसके लेखक के विषय में जानकारी प्राप्त करते हैं। 


शब्दकोश के विषय में-

कुमाउनी-हिंदी शब्दकोश

        अभी तक प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर डॉ. नारायण दत्त पालीवाल द्वारा लिखित ‘कुमाउनी-हिंदी शब्दकोश’ कुमाउनी का पहला शब्दकोश माना गया है। ‘कुमाउनी-हिंदी शब्दकोश’ के पहले संस्करण का प्रकाशन तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली से 1985 में हुआ था। तब इस पुस्तक का मूल्य 300 रू. था। इस शब्दकोश में अ से ज्ञ तक वर्णमाला क्रम में कुमाउनी शब्दों की सूची दी गई है। इसके बाद कुमाउनी के भूले-बिसरे शब्द, कुमाउनी लोकोक्तियाँ व मुहावरे भी दिए गए हैं, साथ ही कुमाउनी भाषा की ध्वन्यात्मकता, उच्चारण व भाषा शास्त्रीय विशेषताओं पर भी प्रकाश डाला गया है। अंत में संदर्भ ग्रंथ सूची दी गई है। इस शब्दकोश के प्रारंभ में कुमाऊँ की बोलियों का भी उल्लेख किया गया है। इस पुस्तक से कुछ पृष्ठ नीचे दिए जा रहे हैं-


किताब का नाम- ‘कुमाउनी-हिंदी शब्दकोश’
विधा- शब्दकोश
लेखक- डॉ.नारायण दत्त पालीवाल
प्रकाशक- तक्षशिला प्रकाशन, नई दिल्ली
प्रकाशन वर्ष- 1985


लेखक के विषय में-

डॉ.नारायण दत्त पालीवाल

       डॉ. नारायण दत्त पालीवाल का जन्म कुमाऊँ प्रदेश के अल्मोड़ा जनपद के ‘पाली’ नामक गांव के एक साधारण परिवार में हुआ था। आपने एम.ए.-हिंदी और एल.एल.बी. की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण कर स्वर्ण पदक प्राप्त किये। आपने बाद में हिंदी में पीएचडी.भी की। आपने व्याख्याता, हिंदी प्रशिक्षक अनुसंधान सहायक, हिंदी अधिकारी, सहायक निदेशक-हिंदी, भाषा उपनिदेशक (दिल्ली प्रशासन), सचिव (साहित्य अकादमी) आदि पदों को सुशोभित किया।

        डॉ. पालीवाल ने कुमाउनी-हिंदी शब्दकोश, कुमाउनी कवियों का विवेचनात्मक अध्ययन, हिंदी स्वयंबोधिनी, कार्यालयों में हिंदी का प्रयोग, कार्यालय हिंदी शब्दावली, हिंदी के बढ़ते चरण, कुमाउनी के लोकगीत (भाग-01), कुमाउनी के लोकगीत (भाग-02), आधुनिक हिंदी का प्रयोग आदि पुस्तकों का लेखन किया। आपके 300 से अधिक शैक्षिक व साहित्यिक आलेख भी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुए।

        डॉ. मोहन चंद तिवारी के अनुसार- “हिंदी भाषा के क्षेत्र में डॉ.पालीवाल जी की एक विशेष पहचान प्रशासनिक हिंदी शब्दावली के शिल्पकार के रूप में रही है। डॉ.पालीवाल द्वारा लिखी गई पुस्तकों का यदि विषय वस्तु की दृष्टि से संक्षेप में विश्लेषण करें तो उसके दो वर्ग स्पष्ट रूप से दिखाई देते हैं। प्रथम वर्ग में वे रचनाएं आती हैं जिनका सम्बन्ध राजभाषा हिन्दी से है तो दूसरे वर्ग में ऐसी पुस्तकें हैं जो लोक-भाषा कुमाऊँनी को लक्ष्य करके लिखी गई हैं। डॉ.पालीवाल ने अपने जीवनकाल में कुल इक्कीस ग्रन्थों की रचना की जिनमें बारह ग्रन्थ राजभाषा हिन्दी से सम्बन्धित थे तथा आठ ग्रन्थ कुमाऊँनी भाषा और संस्कृति के बारे में लिखे गए। डा. नारायणदत्त पालीवाल जी की अन्तिम रचना ‘कुमाउंनी संस्कृति भाषा एवं शब्द सम्पदा’ उनकी समस्त कृतियों में सर्वश्रेष्ठ कृति मानी जाए तो अत्युक्ति नहीं होगी। डा.पालीवाल के अनुसार भारत की सभ्यता और संस्कृति का संवाहक हिमालय है। इसी लोकमंगलकारी हिमालयीय संस्कृति के संस्कारों से उनकी साहित्य साधना भी विशेष रूप से प्रभावित है। आज राष्ट्रीय धरातल पर हम कुमाऊँनी भाषा-संस्कृति के जिस स्वरूप से परिचित हैं, उसके मूल अनुसन्धाता और प्रतिष्ठापक डा. नारायण दत्त पालीवाल ही माने जाते हैं।” 

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