कठिन नहीं कोई भी काम, हर काम संभव है। मुश्किल लगे जो मुकाम, वह मुकाम संभव है - डॉ. पवनेश।

भरी दुपहरी में मैंने इक चांद देखा

भरी दुपहरी में मैंने इक चांद देखा    अंबर देखा, बादल देखे तारों का उन्माद देखा भरी दुपहरी में मैंने इक चांद देखा।   पानी के बुलबुले-सी उसकी हंसी धीरे से मेरे कानों में धंसी कुछ ही पलों बाद मैंने अरमानों का झुंड टहलता आबाद देखा। भरी दुपहरी में मैंने इक चांद देखा।   सिक्के

मुझे वह चुलबुली लड़की याद आती है

मुझे वह चुलबुली लड़की याद आती है   मुझे स्कूल के दिनों की चौथे नंबर की बैंच पर बैठने वाली वह चुलबुली लड़की याद आती है।    उसका हंसना उसका रोना पन्ने पलटते हुए उसका मुड़-मुड़ पीछे देखना उसका हर अंदाज उसकी हर बात याद आती है मुझे वह चुलबुली लड़की याद आती है।   

तेरे प्रेम में त्रिज्या से व्यास बन गई हूँ

तेरे प्रेम में त्रिज्या से व्यास बन गई  हूँ   हरी-भरी धरती थी अब तो नीला आकाश बन गई हूँ तेरे प्रेम में ओ पगले ! त्रिज्या से मैं व्यास बन गई हूँ।   तू क्या जाने मेरे जीवनवृत्त की एकमात्र परिधि तू ही है अब बावली होकर तेरे दिल की आनी-जानी सांस बन गई

स्याही बनकर आती रहो

  स्याही बनकर आती रहो बहुत उदास है जिंदगी इसलिए तुम मुस्काती रहो हम हंसते रहेंगे।  बहुत बेसुरे से हैं सुर इसलिए तुम गाती रहो हम सुनते रहेंगे।  चांद के पास अपनी रोशनी भी तो नहीं इसलिए तुम किरण बनके चमकाने रहो हम चमकते रहेंगे।  बहुत नादान है ये दिल कुछ समझता ही नहीं इसलिए
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